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Samveda Mantra 1780

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ꣢ग्ने꣣ वि꣡व꣢स्वदु꣣ष꣡स꣢श्चि꣣त्र꣡ꣳ राधो꣢꣯ अमर्त्य । आ꣢ दा꣣शु꣡षे꣢ जातवेदो वहा꣣ त्व꣢म꣣द्या꣢ दे꣣वा꣡ꣳ उ꣢ष꣣र्बु꣡धः꣢ ॥१७८०॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । वि꣡व꣢꣯स्वत् । वि । व꣣स्वत् । उष꣡सः꣢ । चि꣣त्र꣢म् । रा꣡धः꣢꣯ । अ꣣मर्त्य । अ । मर्त्य । आ꣢ । दा꣣शु꣡षे । जा꣣तवेदः । जात । वेदः । वह । त्व꣢म् । अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । दे꣣वा꣢न् । उ꣣ष꣡र्बु꣢धः । उ꣣षः । बु꣡धः꣢꣯ ॥१७८०॥

Mantra without Swara
अग्ने विवस्वदुषसश्चित्रꣳ राधो अमर्त्य । आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवाꣳ उषर्बुधः ॥

अग्ने । विवस्वत् । वि । वस्वत् । उषसः । चित्रम् । राधः । अमर्त्य । अ । मर्त्य । आ । दाशुषे । जातवेदः । जात । वेदः । वह । त्वम् । अद्य । अ । द्य । देवान् । उषर्बुधः । उषः । बुधः ॥१७८०॥

Samveda - Mantra Number : 1780
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 2;

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Meaning
हे (अमर्त्य) अमर कीर्तिवाले, (जातवेदः) योग का ज्ञान देनेवाले (अग्ने) योगिराज ! (त्वम्) आप (अद्य) आज (दाशुषे) आत्मसमर्पणकर्ता मेरे लिए (विवस्वत्) तामस वृत्तियों के अन्धकार को दूर करनेवाले, (उषसः) योगमार्ग में उदित हुई ज्योतिष्मती प्रज्ञा के (चित्रम्) अद्भुत (राधः) ऐश्वर्य को और (उषर्बुधः देवान्) उषाकाल में जागनेवाले दिव्य गुणों को (आ वह) प्राप्त कराओ ॥१॥
Essence
परमात्मा की कृपा से, जीवात्मा के निरन्तर किये जानेवाले प्रयत्न से और योग सिखानेवाले गुरु की शिक्षा से उत्तरोत्तर नवीन-नवीन उपलब्धियाँ योगाभ्यासी को होती हैं और विवेकख्याति द्वारा मोक्ष भी प्राप्त हो जाता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वाचिक में ४० क्रमाङ्क पर हो चुकी है। यहाँ योग का विषय दर्शाया जा रहा है।

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