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Samveda Mantra 1771

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रियमेध आङ्गिरसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ꣢ त्वा꣣ र꣢थं꣣ य꣢थो꣣त꣡ये꣢ सु꣣म्ना꣡य꣢ वर्तयामसि । तु꣣विकूर्मि꣡मृ꣢ती꣣ष꣢हमि꣡न्द्रं꣢ शविष्ठ꣣ स꣡त्प꣢तिम् ॥१७७१॥

आ꣢ । त्वा꣣ । र꣡थ꣢꣯म् । य꣡था꣢꣯ । ऊ꣣त꣡ये꣢ । सु꣣म्ना꣡य꣢ । व꣣र्तयामसि । तुविकूर्मि꣢म् । तु꣣वि । कूर्मि꣢म् । ऋ꣣तीष꣡ह꣢म् । ऋति । स꣣हम् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । श꣣विष्ठ । स꣡त्प꣢꣯तिम् । सत् । प꣣तिम् ॥१७७१॥

Mantra without Swara
आ त्वा रथं यथोतये सुम्नाय वर्तयामसि । तुविकूर्मिमृतीषहमिन्द्रं शविष्ठ सत्पतिम् ॥

आ । त्वा । रथम् । यथा । ऊतये । सुम्नाय । वर्तयामसि । तुविकूर्मिम् । तुवि । कूर्मिम् । ऋतीषहम् । ऋति । सहम् । इन्द्रम् । शविष्ठ । सत्पतिम् । सत् । पतिम् ॥१७७१॥

Samveda - Mantra Number : 1771
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शविष्ठ) बलिष्ठ परमेश्वर वा जीवात्मन् ! (तुविकूर्मिम्) बहुत-से कर्मों के कर्ता, (ऋतीषहम्) आक्रामक शत्रु-सेनाओं को पराजित करनेवाले, (सत्पतिम्) सज्जनों के पालनकर्ता (इन्द्रं त्वा) सत्य, अहिंसा आदि ऐश्वर्यों से युक्त, विघ्नों को दूर करने में समर्थ आप परमेश्वर वा जीवात्मा को, हम (ऊतये) रक्षा के लिए और (सुम्नाय) सुख के लिए (आवर्तयामसि) अपनी ओर प्रवृत्त करते हैं, (यथा) जिस प्रकार (रथम्) रथ को प्रवृत्त किया जाता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
मनुष्य यदि परमेश्वर की उपासना करे और उसका आत्मा यदि जागरूक तथा सक्रिय हो जाए, तो वह महान् उत्कर्ष और मोक्ष को भी प्राप्त कर सकता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वाचिक में ३५४ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ परमात्मा और जीवात्मा को सम्बोधन करते हैं।