Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 1768

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेधो वामदेवो वा Chhand- द्विपदा गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢ ब्र꣣ह्मा꣢꣫ य ऋ꣣त्वि꣢य꣣ इ꣢न्द्रो꣣ ना꣡म꣢ श्रु꣣तो꣢ गृ꣣णे ॥१७६८॥

ए꣣षः꣢ । ब्र꣡ह्मा꣢ । यः । ऋ꣣त्वि꣡यः꣢ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । ना꣡म꣢꣯ । श्रु꣣तः꣢ । गृ꣣णे꣢ ॥१७६८॥१

Mantra without Swara
एष ब्रह्मा य ऋत्विय इन्द्रो नाम श्रुतो गृणे ॥

एषः । ब्रह्मा । यः । ऋत्वियः । इन्द्रः । नाम । श्रुतः । गृणे ॥१७६८॥१

Samveda - Mantra Number : 1768
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 1;

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(एषः) यह जगदीश्वर वा आचार्य (ब्रह्मा) चारों वेदों का ज्ञाता है, (यः) जो (ऋत्वियः) ऋतुओं का स्वामी वा ऋतु-ऋतु में विद्या की वर्षा करनेवाला है, उस जगदीश्वर वा आचार्य का (इन्द्रः नाम) इन्द्र नाम है। उसके द्वारा मैं (श्रुतः) कीर्तिमान् वा बहुश्रुत किया गया हूँ। उसकी मैं (गृणे) अर्चना वा स्तुति करता हूँ ॥१॥
Essence
जैसे सृष्टि के आदि में चारों वेदों का प्रकाशक, सब ऋतुओं को रचनेवाला परमेश्वर सबके द्वारा पूजा करने योग्य है, वैसे ही वेद-वेदाङ्गों को पढ़ानेवाला, प्रत्येक ऋतु में विद्या की वर्षा करनेवाला आचार्य भी सत्कार के योग्य है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ४३८ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ जगदीश्वर और आचार्य दोनों को कह रहे हैं।