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Samveda Mantra 1764

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣢ नो꣣ वि꣡श्वा꣢ दि꣣वो꣢꣫ वसू꣣तो꣡ पृ꣢थि꣣व्या꣡ अधि꣢꣯ । पु꣣नान꣡ इ꣢न्द꣣वा꣡ भ꣢र ॥१७६४॥

सः꣢ । नः꣣ । वि꣡श्वा꣢꣯ । दि꣣वः꣢ । व꣡सु꣢꣯ । उ꣣त꣢ । उ꣢ । पृथिव्याः꣢ । अ꣡धि꣢꣯ । पु꣣नानः꣢ । इ꣣न्दो । आ꣡ । भ꣢र ॥१७६४॥

Mantra without Swara
स नो विश्वा दिवो वसूतो पृथिव्या अधि । पुनान इन्दवा भर ॥

सः । नः । विश्वा । दिवः । वसु । उत । उ । पृथिव्याः । अधि । पुनानः । इन्दो । आ । भर ॥१७६४॥

Samveda - Mantra Number : 1764
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 5;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्दो) आनन्द-रस से भिगोनेवाले रसागार जगदीश ! (पुनानः) पवित्र करते हुए (सः) वे धनाधीश आप (दिवः) आत्मलोक से (उत उ) और (पृथिव्याः अधि) पार्थिव देह से (विश्वा वसु) सब आत्मबल, योगसिद्धि, आरोग्य आदि धनों को (नः) हमारे लिए (आ भर) लाओ ॥४॥
Essence
परमेश्वर की कृपा से हम शारीरिक उन्नति और आत्मिक उन्नति करते हुए अभ्युदय और निःश्रेयस के अधिकारी हों ॥४॥ इस खण्ड में प्राकृतिक और आध्यात्मिक उषाओं, प्राणापानों से चालित शरीर-रथ, परमेश्वर और परमेश्वर से होनेवाली आनन्द-वर्षाओं का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ उन्नीसवें अध्याय में पाँचवाँ खण्ड समाप्त ॥ उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ अष्टम प्रपाठक में तृतीय अर्ध समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर से प्रार्थना की गयी है।