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Samveda Mantra 1761

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣢ ते꣣ धा꣡रा꣢ अस꣣श्च꣡तो꣢ दि꣣वो꣡ न य꣢꣯न्ति वृ꣣ष्ट꣡यः꣢ । अ꣢च्छा꣣ वा꣡ज꣢ꣳ सह꣣स्रि꣡ण꣢म् ॥१७६१॥

प्र꣢ । ते꣣ । धा꣡राः꣢꣯ । अ꣣सश्च꣡तः꣢ । अ꣣ । सश्च꣡तः꣢ । दि꣣वः꣢ । न । य꣣न्ति । वृष्ट꣡यः꣢ । अ꣡च्छ꣢꣯ । वा꣡ज꣢꣯म् । स꣣हस्रि꣡ण꣢म् ॥१७६१॥

Mantra without Swara
प्र ते धारा असश्चतो दिवो न यन्ति वृष्टयः । अच्छा वाजꣳ सहस्रिणम् ॥

प्र । ते । धाराः । असश्चतः । अ । सश्चतः । दिवः । न । यन्ति । वृष्टयः । अच्छ । वाजम् । सहस्रिणम् ॥१७६१॥

Samveda - Mantra Number : 1761
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 5;

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Meaning
हे पवमान सोम अर्थात् पवित्र करनेवाले रसागर परमेश्वर ! (असश्चतः) किसी से भी रुकावट न डाली गई (ते) आपकी (धाराः) आनन्द-धाराएँ (सहस्रिणम्) सहस्र संख्यावाले (वाजम्) बल को (अच्छ) प्राप्त कराने के लिए (प्र यन्ति) उपासक के पास पहुँचती हैं, (दिवः) न जैसे आकाश से (वृष्टयः) वर्षाएँ (वाजम्) अन्न को (अच्छ) प्राप्त कराने के लिए (प्रयन्ति) भूतल पर पहुँचती हैं ॥१॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
जैसे मेघ से वर्षा की धाराएँ अन्न उत्पन्न करने के लिए खेतों पर बरसती हैं, वैसे ही जगदीश्वर से आनन्द की धाराएँ बल उत्पन्न करने के लिए उपासकों के अन्तरात्मा में बरसती हैं ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में आनन्द-वर्षाओं का वर्णन है।

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