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Samveda Mantra 1751

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स꣣मानो꣢꣫ अध्वा꣣ स्व꣡स्रो꣢रन꣣न्त꣢꣫स्तम꣣न्या꣡न्या꣢ चरतो दे꣣व꣡शि꣢ष्टे । न꣡ मे꣢थेते꣣ न꣡ त꣢स्थतुः सु꣣मे꣢के꣣ न꣢क्तो꣣षा꣢सा꣣ स꣡म꣢नसा꣣ वि꣡रू꣢पे ॥१७५१॥

स꣣मानः꣢ । स꣣म् । आनः꣢ । अ꣡ध्वा꣢꣯ । स्व꣡स्रोः꣢꣯ । अ꣣नन्तः꣣ । अ꣣न् । अन्तः꣢ । तम् । अ꣣न्या꣡न्या꣢ । अ꣣न्या꣢ । अ꣣न्या꣢ । चरतः । देव꣡शि꣢ष्टे । दे꣣व꣢ । शि꣣ष्टेइ꣡ति꣢ । न । मे꣣थेतेइ꣡ति꣢ । न । त꣣स्थतुः । सुमे꣡के꣢ । सु꣣ । मे꣣के꣢꣯इ꣡ति꣢ । न꣡क्ता꣢꣯ । उ꣣षा꣡सा꣢ । स꣡म꣢꣯नसा । स । म꣣नसा । वि꣡रू꣢꣯पे । वि । रू꣣पेइ꣡ति꣢ ॥१७५१॥

Mantra without Swara
समानो अध्वा स्वस्रोरनन्तस्तमन्यान्या चरतो देवशिष्टे । न मेथेते न तस्थतुः सुमेके नक्तोषासा समनसा विरूपे ॥

समानः । सम् । आनः । अध्वा । स्वस्रोः । अनन्तः । अन् । अन्तः । तम् । अन्यान्या । अन्या । अन्या । चरतः । देवशिष्टे । देव । शिष्टेइति । न । मेथेतेइति । न । तस्थतुः । सुमेके । सु । मेकेइति । नक्ता । उषासा । समनसा । स । मनसा । विरूपे । वि । रूपेइति ॥१७५१॥

Samveda - Mantra Number : 1751
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 4;

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1 Bhashyas
Meaning
(स्वस्रोः) रात्रि और उषा-रूप इन दोनों बहिनों का (समानः) एक ही (अनन्तः) अनन्त (अध्वा) मार्ग है। (तम्) उस आकाशरूप मार्ग पर (देवशिष्टे) जगदीश्वर के अनुशासन में रहती हुई (अन्यान्या) एक-दूसरी की गलबहियाँ लेकर (चरतः) विचर रही हैं। ये (सुमेके) भली-भाँति नियमों में बँधी हुई, (विरूपे) काले-गोरे विभिन्न रूपोंवाली और (समनसा) समान मन वालियों जैसी (नक्तोषासा) रात्रि और उषा (न मेथेते) एक-दूसरी की हिंसा नहीं करतीं, (न तस्थतुः) न कार्य से विरत होती हैं, प्रत्युत सृष्टि से लेकर विश्राम-प्रदान और प्रकाश-प्रदान-रूप अपने-अपने कार्य में संलग्न हैं ॥३॥ यहाँ रात्रि और उषा में बहिनों का आरोप होने से रूपक अलङ्कार है ॥ ‘समनसा’ में लुप्तोपमा है ॥३॥
Essence
रात्री और उषा के समान अपरा और परा विद्या को भी मनुष्य यदि सामञ्जस्यपूर्वक ग्रहण करें तो निश्चय ही अभ्युदय और निःश्रेयस की सिद्धि हो सकती है ॥३॥
Subject
आगे फिर उसी विषय का वर्णन है।