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Samveda Mantra 1741

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- सत्यश्रवा आत्रेयः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
या꣡ सु꣢नी꣣थे꣡ शौ꣢चद्र꣣थे꣡ व्यौच्छो꣢꣯ दुहितर्दिवः । सा꣡ व्यु꣢च्छ꣣ स꣡ही꣢यसि स꣣त्य꣡श्र꣢वसि वा꣣य्ये꣡ सुजा꣢꣯ते꣣ अ꣡श्व꣢सूनृते ॥१७४१॥

या꣢ । सु꣣नीथे꣢ । सु꣣ । नीथे꣢ । शौ꣣चद्रथे꣢ । शौ꣣चत् । रथे꣢ । व्यौ꣡च्छः꣢꣯ । वि꣣ । औ꣡च्छः꣢꣯ । दु꣣हितः । दिवः । सा꣢ । वि । उच्छ । स꣡ही꣢꣯यसि । स꣣त्य꣡श्र꣢वसि । स꣣त्य꣢ । श्र꣣वसि । वाय्ये꣢ । सु꣡जा꣢꣯ते । सु । जा꣣ते । अ꣡श्व꣢꣯सू꣣नृते । अ꣡श्व꣢꣯ । सू꣣नृते ॥१७४१॥

Mantra without Swara
या सुनीथे शौचद्रथे व्यौच्छो दुहितर्दिवः । सा व्युच्छ सहीयसि सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते ॥

या । सुनीथे । सु । नीथे । शौचद्रथे । शौचत् । रथे । व्यौच्छः । वि । औच्छः । दुहितः । दिवः । सा । वि । उच्छ । सहीयसि । सत्यश्रवसि । सत्य । श्रवसि । वाय्ये । सुजाते । सु । जाते । अश्वसूनृते । अश्व । सूनृते ॥१७४१॥

Samveda - Mantra Number : 1741
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सुजाते) सुप्रसिद्ध, (अश्वसूनृते) व्यापक प्रिय सत्य वेदवाणीवाली (दिवः दुहितः) दिव्य प्रकाश को दुह कर देनेवाली जगन्माता ! (या) जो प्रसिद्ध तू (शौचद्रथे) अतिशय पवित्र आत्मा रूप रथवाले, (सुनीथे) उत्तम नेतृत्व करनेवाले मनुष्य में (व्यौच्छः) प्रकाश देती है, (सा) वह तू (सहीयसि) अतिशय सहनशील, (सत्यश्रवसि) सच्ची कीर्तिवाले (वाय्ये) खड्डी में धागों के समान फैलाने योग्य मेरे जीवन में भी (व्युच्छ) विवेकख्याति का प्रकाश कर ॥२॥
Essence
जो पवित्र आचरणवाले नेता लोग होते हैं, उनमें पवित्रता और नेतृत्व का बल जगन्माता ही निहित करती है, वैसे ही वह हमारा भी जीवन पवित्र करके, विवेकख्याति का प्रकाश उत्पन्न कर हमें मोक्ष का अधिकारी बना देवे ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर जगन्माता से प्रार्थना की गयी है।