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Samveda Mantra 1740

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- सत्यश्रवा आत्रेयः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
म꣣हे꣡ नो꣢ अ꣣द्य꣡ बो꣢ध꣣यो꣡षो꣢ रा꣣ये꣢ दि꣣वि꣡त्म꣢ती । य꣡था꣢ चिन्नो꣣ अ꣡बो꣢धयः स꣣त्य꣡श्र꣢वसि वा꣣य्ये꣡ सुजा꣢꣯ते꣣ अ꣡श्व꣢सूनृते ॥१७४०॥

म꣡हे꣢ । नः꣣ । अद्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । बो꣣धय । उ꣡षः꣢꣯ । रा꣣ये꣢ । दि꣣वि꣡त्म꣢ती । य꣡था꣢꣯ । चि꣣त् । नः । अ꣡बो꣢धयः । स꣣त्य꣡श्र꣢वसि । स꣣त्य꣢ । श्र꣣वसि । वाय्ये꣢ । सु꣡जा꣢꣯ते । सु । जा꣣ते । अ꣡श्व꣢꣯सूनृते । अ꣡श्व꣢꣯ । सू꣣नृते ॥१७४०॥

Mantra without Swara
महे नो अद्य बोधयोषो राये दिवित्मती । यथा चिन्नो अबोधयः सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते ॥

महे । नः । अद्य । अ । द्य । बोधय । उषः । राये । दिवित्मती । यथा । चित् । नः । अबोधयः । सत्यश्रवसि । सत्य । श्रवसि । वाय्ये । सुजाते । सु । जाते । अश्वसूनृते । अश्व । सूनृते ॥१७४०॥

Samveda - Mantra Number : 1740
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सुजाते) सुप्रसिद्ध, (अश्वसूनृते) व्यापक प्रिय सत्य वेदवाणीवाली (उषः) उषा के समान जगानेवाली जगन्माता ! (दिवित्मती) दिव्य प्रकाश से देदीप्यमान तू (नः) हमें (महे राये) महान् अभ्युदय और मोक्ष रूप ऐश्वर्य के लिए (अद्य) आज भी (बोधय) वैसे ही जगा (यथा चित्) जैसे, (सत्यश्रवसि) सच्ची कीर्तिवाले, (वाय्ये) खड्डी में धागों के समान फैलाने योग्य हमारे पूर्व जीवन में (नः) हमें (अबोधयः) जगाती रही है ॥१॥
Essence
जैसे प्राकृतिक उषा सब प्राणियों को और कोई माँ अपनी सन्तानों को जगाती और श्रेष्ठ कर्मों में लगाती हैं, वैसे ही जगदीश्वरी माँ हम अबोधों को जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त अपने कर्तव्य-पालन के लिए दिन-रात जगाती रहे, जिससे हम कीर्ति, अभ्युदय और मोक्ष प्राप्त करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ४२१ क्रमाङ्क पर अध्यात्म-प्रभा के विषय में की गयी थी। यहाँ जगन्माता को सम्बोधन है।