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Samveda Mantra 1736

1875 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
या꣢वि꣣त्था꣢꣫ श्लोक꣣मा꣢ दि꣣वो꣢꣫ ज्योति꣣र्ज꣡ना꣢य च꣣क्र꣡थुः꣢ । आ꣢ न꣣ ऊ꣡र्जं꣢ वहतमश्विना यु꣣व꣢म् ॥१७३६॥

यौ꣢ । इ꣣त्था꣢ । श्लो꣡क꣢꣯म् । आ । दि꣣वः꣢ । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । ज꣡ना꣢꣯य । च꣣क्र꣡थुः꣢ । आ । नः꣣ । ऊ꣡र्ज꣢꣯म् । व꣣हतम् । अश्विना । युव꣢म् ॥१७३६॥

Mantra without Swara
यावित्था श्लोकमा दिवो ज्योतिर्जनाय चक्रथुः । आ न ऊर्जं वहतमश्विना युवम् ॥

यौ । इत्था । श्लोकम् । आ । दिवः । ज्योतिः । जनाय । चक्रथुः । आ । नः । ऊर्जम् । वहतम् । अश्विना । युवम् ॥१७३६॥

Samveda - Mantra Number : 1736
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विनौ) जीवन में व्याप्त प्राणापानो ! (यौ) जो तुम दोनों (इत्था) सचमुच (जनाय) योगसाधक मनुष्य के लिए (दिवः) तेजस्वी जीवात्मा की (श्लोकम्) स्तुतियोग्य (ज्योतिः) ज्योति (चक्रथुः) उत्पन्न करते हो, वे (युवम्) तुम दोनों (नः) हमें (ऊर्जम्) बल (आवहतम्) प्राप्त कराओ ॥३॥
Essence
प्राणायाम द्वारा प्रकाश पर पड़े हुए आवरण के क्षय से ज्योति की प्राप्ति और आत्मा तथा प्राण के बल की प्राप्ति होने पर धारणाओं में मन की योग्यता हो जाती है ॥३॥ इस खण्ड में प्राकृतिक और दिव्य उषा, ॠतम्भरा प्रज्ञा, आत्मा-मन, जगदम्बा और प्राण-अपान के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ उन्नीसवें अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
Subject
आगे फिर उसी विषय को कहते हैं।