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Samveda Mantra 1732

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
उ꣡षो꣢ अ꣣द्ये꣡ह गो꣢꣯म꣣त्य꣡श्वा꣢वति विभावरि । रे꣣व꣢द꣣स्मे꣡ व्यु꣢च्छ सूनृतावति ॥१७३२॥

उ꣡षः꣢꣯ । अ꣣द्य꣡ । अ꣣ । द्य꣢ । इ꣣ह꣢ । गो꣣मति । अ꣡श्वा꣢꣯वति । वि꣣भावरि । वि । भावरि । रेव꣢त् । अ꣣स्मे꣡इति꣢ । वि । उ꣣च्छ । सूनृतावति । सु । नृतावति ॥१७३२॥

Mantra without Swara
उषो अद्येह गोमत्यश्वावति विभावरि । रेवदस्मे व्युच्छ सूनृतावति ॥

उषः । अद्य । अ । द्य । इह । गोमति । अश्वावति । विभावरि । वि । भावरि । रेवत् । अस्मेइति । वि । उच्छ । सूनृतावति । सु । नृतावति ॥१७३२॥

Samveda - Mantra Number : 1732
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 2;

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Meaning
(गोमति) गौओं और दिव्य प्रकाशोंवाली, (अश्वावति) घोड़ों और प्राणबलोंवाली, (विभावरि) ज्योतिर्मयी, (सूनृतावति) प्रिय, सत्य, मधुर वेदवाणीवाली, (उषः) हे जगन्माता ! तू (अद्य) आज (इह) इस हमारे जीवन में (अस्मे) हमारे लिए (रेवत्) दिव्य ऐश्वर्य के साथ उदित होती हुई (व्युच्छ) तमोगुण की अधिकता का निवारण कर दे ॥२॥
Essence
जैसे ज्योतिर्मयी उषा रात्रि के अन्धकार को हटाती है, वैसे ही जगन्माता स्तोताओं के मानस-पटल से तमोगुण के साम्राज्य को दूर करके उन्हें सत्त्वगुण की प्रधानतावाला कर देती है ॥२॥
Subject
आगे फिर वही विषय कहा गया है।

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