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Samveda Mantra 1728

1875 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣षो꣢ उ꣣षा꣡ अपू꣢꣯र्व्या꣣꣬ व्यु꣢꣯च्छति प्रि꣣या꣢ दि꣣वः꣢ । स्तु꣣षे꣡ वा꣢मश्विना बृ꣣ह꣢त् ॥१७२८॥

ए꣣षा꣢ । उ꣣ । उषाः꣢ । अ꣡पू꣢꣯र्व्या । अ । पू꣣र्व्या । वि꣢ । उ꣣च्छति । प्रिया꣢ । दि꣣वः꣢ । स्तु꣣षे꣢ । वा꣣म् । अश्विना । बृह꣢त् ॥१७२८॥

Mantra without Swara
एषो उषा अपूर्व्या व्युच्छति प्रिया दिवः । स्तुषे वामश्विना बृहत् ॥

एषा । उ । उषाः । अपूर्व्या । अ । पूर्व्या । वि । उच्छति । प्रिया । दिवः । स्तुषे । वाम् । अश्विना । बृहत् ॥१७२८॥

Samveda - Mantra Number : 1728
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 2;

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Meaning
(एषा उ) यह (अपूर्व्या) अपूर्व, (प्रिया) प्रिय (उषाः) प्रकाशमयी ऋतम्भरा प्रज्ञा (दिवः) देदीप्यमान आत्मलोक से (व्युच्छति) प्रकट हो रही है। हे (अश्विनौ) उस ऋतम्भरा प्रज्ञा से चमत्कृत मन और आत्मा ! मैं (वाम्) तुम दोनों की (बृहत्) बहुत अधिक (स्तुषे) स्तुति करता हूँ ॥१॥
Essence
जब योगी के मानस आकाश में ऋतम्भरा प्रज्ञारूप दिव्य उषा प्रकट होती है, तब शरीर में स्थित आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय आदि सभी दिव्य ज्योति से प्रदीप्त हो जाते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में १७८ क्रमाङ्क पर पहले व्याख्या की जा चुकी है। यहाँ ऋतम्भरा प्रज्ञा का वर्णन है।

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