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Samveda Mantra 1724

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
मा꣢ ते꣣ रा꣡धा꣢ꣳसि꣣ मा꣢ त꣢ ऊ꣣त꣡यो꣢ वसो꣣ऽस्मा꣡न्कदा꣢꣯ च꣣ना꣡ द꣢भन् । वि꣡श्वा꣢ च न उपमिमी꣣हि꣡ मा꣢नुष꣣ व꣡सू꣢नि चर्ष꣣णि꣢भ्य꣣ आ꣢ ॥१७२४॥

मा꣢ । ते꣣ । रा꣡धा꣢꣯ꣳसि । मा । ते꣣ । ऊत꣡यः꣢ । व꣣सो । अस्मा꣢न् । क꣡दा꣢꣯ । च꣢ । न꣢ । द꣣भन् । वि꣡श्वा꣢꣯ । च꣣ । नः । उपमिमीहि꣢ । उ꣣प । मिमीहि꣢ । मा꣣नुष । व꣡सू꣢꣯नि । च꣣र्षणि꣡भ्यः꣢ । आ ॥१७२४॥

Mantra without Swara
मा ते राधाꣳसि मा त ऊतयो वसोऽस्मान्कदा चना दभन् । विश्वा च न उपमिमीहि मानुष वसूनि चर्षणिभ्य आ ॥

मा । ते । राधाꣳसि । मा । ते । ऊतयः । वसो । अस्मान् । कदा । च । न । दभन् । विश्वा । च । नः । उपमिमीहि । उप । मिमीहि । मानुष । वसूनि । चर्षणिभ्यः । आ ॥१७२४॥

Samveda - Mantra Number : 1724
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वसो) निवासप्रद जगदीश्वर वा आचार्य ! (मा) न तो (ते) आपके (राधांसि) अहिंसा, सत्य आदि ऐश्वर्य और (मा) न ही (ते) आपकी (ऊतयः) रक्षाएँ (अस्मान्) हम आपके उपासकों वा आपके शिष्यों को (कदा चन) कभी भी (आदभन्) अपनी प्राप्ति से वञ्चित करें। हे (मानुष) मनुष्यों के हितकर्ता ! (चर्षणिभ्यः नः) हम मानवों को, आप (विश्वा च वसूनि) सभी ऐश्वर्य धन, धान्य, विद्या, दीर्घायुष्य, अभ्युदय, निःश्रेयस आदि (आ उपमिमीहि) चारों ओर से प्राप्त कराओ ॥२॥
Essence
मनुष्यों को चाहिए कि परमात्मा और आचार्य का सेवन करके सब दिव्य ऐश्वर्य, सब योगविभूतियाँ और सब रक्षाएँ प्राप्त करें ॥२॥ इस खण्ड में जीवात्मा, परमात्मा, उपासक और गुरु-शिष्यों के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ उन्नीसवें अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर उन्हीं को संबोधन किया गया है।