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Samveda Mantra 1723

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
त्व꣢म꣣ङ्ग꣡ प्र श꣢꣯ꣳसिषो दे꣣वः꣡ श꣢विष्ठ꣣ म꣡र्त्य꣢म् । न꣢꣫ त्वद꣣न्यो꣡ म꣢घवन्नस्ति मर्डि꣣ते꣢न्द्र꣣ ब्र꣡वी꣢मि ते꣣ व꣡चः꣢ ॥१७२३॥

त्व꣢म् । अ꣣ङ्ग꣢ । प्र । श꣣ꣳसिषः । देवः꣢ । श꣣विष्ठ । म꣡र्त्य꣢꣯म् । न । त्वत् । अ꣣न्यः꣢ । अ꣣न् । यः꣢ । म꣣घवन् । अस्ति । मर्डिता꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯ । ब्र꣡वी꣢꣯मि । ते꣣ । व꣡चः꣢꣯ ॥१७२३॥

Mantra without Swara
त्वमङ्ग प्र शꣳसिषो देवः शविष्ठ मर्त्यम् । न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मर्डितेन्द्र ब्रवीमि ते वचः ॥

त्वम् । अङ्ग । प्र । शꣳसिषः । देवः । शविष्ठ । मर्त्यम् । न । त्वत् । अन्यः । अन् । यः । मघवन् । अस्ति । मर्डिता । इन्द्र । ब्रवीमि । ते । वचः ॥१७२३॥

Samveda - Mantra Number : 1723
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शविष्ठ) आत्मबल से बलिष्ठ जगदीश्वर वा आचार्य ! (देवः) प्रकाशक और विद्या आदि के दाता (त्वम्) आप (अङ्ग) शीघ्र ही (मर्त्यम्) उपासक मनुष्य वा शिष्य को (प्र शंसिषः) प्रशंसा का पात्र बनाओ। हे (मघवन्) सकल ऐश्वर्यों से युक्त जगदीश्वर वा विद्या के ऐश्वर्य से युक्त आचार्य ! (त्वत् अन्यः) आपसे भिन्न कोई (मर्डिता) मोक्ष-प्रदान वा विद्या आदि के प्रदान के द्वारा सुखदाता (न अस्ति) नहीं है। हे (इन्द्र) जगदीश्वर वा आचार्य ! मैं (ते) आपके लिए (वचः) प्रार्थना-वचन (ब्रवीमि) उच्चारण कर रहा हूँ ॥१॥
Essence
परमेश्वर की उपासना करके और आचार्य के समीप शिष्यभाव से पहुँच कर मनुष्यों को सब अभ्युदय और निःश्रेयस प्राप्त करना चाहिए ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में २४७ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के विषय में की गयी थी। यहाँ जगदीश्वर और आचार्य को सम्बोधन है।