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Samveda Mantra 1718

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
आ꣢ म꣣न्द्रै꣡रि꣢न्द्र꣣ ह꣡रि꣢भिर्या꣣हि꣢ म꣣यू꣡र꣢रोमभिः । मा꣢ त्वा꣣ के꣢ चि꣣न्नि꣡ ये꣢मु꣣रि꣢꣫न्न पा꣣शि꣢꣫नोऽति꣣ ध꣡न्वे꣢व꣣ ता꣡ꣳ इ꣢हि ॥१७१८॥

आ꣢ । म꣣न्द्रैः꣢ । इ꣣न्द्र । ह꣡रि꣢꣯भिः । या꣣हि꣢ । म꣣यू꣡र꣢रोमभिः । म꣣यू꣡र꣢ । रो꣣मभिः । मा꣢ । त्वा꣣ । के꣢ । चि꣣त् । नि꣢ । ये꣣मुः । इ꣢त् । न । पा꣣शि꣡नः꣢ । अ꣡ति꣢꣯ । ध꣡न्व꣢꣯ । इ꣣व । ता꣢न् । इ꣣हि ॥१७१८॥

Mantra without Swara
आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि मयूररोमभिः । मा त्वा के चिन्नि येमुरिन्न पाशिनोऽति धन्वेव ताꣳ इहि ॥

आ । मन्द्रैः । इन्द्र । हरिभिः । याहि । मयूररोमभिः । मयूर । रोमभिः । मा । त्वा । के । चित् । नि । येमुः । इत् । न । पाशिनः । अति । धन्व । इव । तान् । इहि ॥१७१८॥

Samveda - Mantra Number : 1718
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 1;

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Meaning
हे (इन्द्र) मेरे अन्तरात्मन् ! तू (मन्द्रैः) तृप्ति देनेवाले, (मयूररोमभिः) मोरों के रोमों के समान आकर्षक जिनके रोम अर्थात् विषय-ग्रहण सामर्थ्य हैं, ऐसे (हरिभिः) मन, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रियों के साथ (आयाहि) आ, अर्थात् ज्ञानक्षेत्र और कर्मक्षेत्र में उतर। आने की इच्छावाले (त्वा) तुझे (केचित्) कोई भी बाधक शत्रु वा विघ्न (मा नियेमुः) रोक न सकें, (पाशिनः) जाल हाथ में लिए व्याध आदि (इत् न) जैसे गतिशील पक्षी आदि को जाल में रोक लेते हैं। तू (धन्वा इव) धनुर्धारी के समान (तान्) उन बाधकों को (अति इहि) लाँघ जा ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
मनुष्यों को यह योग्य है कि वे अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन देकर बाधक शत्रुओं वा विघ्नों को पराजित करके अपनी उन्नति करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २४६ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के आह्वान के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ जीवात्मा को उद्बोधन देते हैं।

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