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Samveda Mantra 1717

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त꣡ꣳ हि꣢न्वन्ति मद꣣च्यु꣢त꣣ꣳ ह꣡रिं꣢ न꣣दी꣡षु꣢ वा꣣जि꣡न꣢म् । इ꣢न्दु꣣मि꣡न्द्रा꣢य मत्स꣣र꣢म् ॥१७१७॥

त꣢म् । हि꣣न्वन्ति । मदच्यु꣡त꣢म् । म꣣द । च्यु꣡त꣢꣯म् । ह꣡रि꣢꣯म् । न꣣दी꣡षु꣢ । वा꣣जि꣡न꣢म् । इ꣡न्दु꣢꣯म् । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । म꣣त्सर꣢म् ॥१७१७॥

Mantra without Swara
तꣳ हिन्वन्ति मदच्युतꣳ हरिं नदीषु वाजिनम् । इन्दुमिन्द्राय मत्सरम् ॥

तम् । हिन्वन्ति । मदच्युतम् । मद । च्युतम् । हरिम् । नदीषु । वाजिनम् । इन्दुम् । इन्द्राय । मत्सरम् ॥१७१७॥

Samveda - Mantra Number : 1717
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 1;

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Meaning
प्रबोध को प्राप्त जागरूक उपासक लोग (मदच्युतम्) उत्साहवर्षी, (हरिम्) पापहर्ता, (वाजिनम्) बलवान् (मत्सरम्) तृप्तिप्रद (तम्) उस अद्भुत (इन्दुम्) ब्रह्मानन्द-रस को (नदीषु) धाराओं के रूप में (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए (हिन्वन्ति) प्रेरित करते हैं ॥४॥
Essence
जो लोग परमात्मा की उपासना द्वारा ब्रह्मानन्द की धाराओं से अपने आत्मा को तृप्त करते हैं, वे धन्य हो जाते हैं ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में उपासक लोग क्या करते हैं, यह कहा गया है।

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