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Samveda Mantra 1714

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣢त्ते꣣ शु꣡ष्मा꣢सो अस्थू꣣ र꣡क्षो꣢ भि꣣न्द꣡न्तो꣢ अद्रिवः । नु꣣द꣢स्व꣣ याः꣡ प꣢रि꣣स्पृ꣡धः꣢ ॥१७१४॥

उ꣢त् । ते꣣ । शु꣡ष्मा꣢꣯सः । अ꣣स्थुः । र꣡क्षः꣢꣯ । भि꣣न्द꣡न्तः꣢ । अ꣣द्रिवः । अ । द्रिवः । नुद꣡स्व꣢ । याः । प꣣रिस्पृ꣡धः꣢ । प꣣रि । स्पृ꣡धः꣢꣯ ॥१७१४॥

Mantra without Swara
उत्ते शुष्मासो अस्थू रक्षो भिन्दन्तो अद्रिवः । नुदस्व याः परिस्पृधः ॥

उत् । ते । शुष्मासः । अस्थुः । रक्षः । भिन्दन्तः । अद्रिवः । अ । द्रिवः । नुदस्व । याः । परिस्पृधः । परि । स्पृधः ॥१७१४॥

Samveda - Mantra Number : 1714
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 1;

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Meaning
हे (अद्रिवः) किसी से विदीर्ण न किये जा सकने योग्य पवमान सोम अर्थात् पवित्रतादायक सद्गुणकर्मप्रेरक जगदीश ! (ते) आपके (शुष्मासः) बल (रक्षः) काम, क्रोध, आदि छहों रिपुओं को और व्याधि, स्त्यान, संशय आदि योग-मार्ग के विघ्नों को (भिन्दन्तः) तोड़ते-फोड़ते हुए (अस्थुः) दृढ़ता से स्थित रहते हैं। (याः परिस्पृधः) जो स्पर्धाशील आन्तरिक वा बाह्य शत्रु-सेनाएँ हैं उन्हें आप (नुदस्व) परे खदेड़ दो ॥१॥
Essence
परमेश्वर की आराधना से मनुष्य सब आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं को जीतने के लिए अपार बल, साहस और उद्बोधन प्राप्त करता है ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में स्तुतिपूर्वक परमेश्वर से प्रार्थना की गयी है।