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Samveda Mantra 1713

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡ नो꣢ मित्रमह꣣स्त्व꣡मग्ने꣢꣯ शु꣣क्रे꣡ण꣢ शो꣣चि꣡षा꣢ । दे꣣वै꣡रा स꣢꣯त्सि ब꣣र्हि꣡षि꣢ ॥१७१३॥

सः꣢ । नः꣣ । मित्रमहः । मित्र । महः । त्व꣢म् । अ꣡ग्ने꣢꣯ । शु꣣क्रे꣡ण꣢ । शो꣣चि꣡षा꣢ । दे꣣वैः꣢ । आ । स꣣त्सि । बर्हि꣡षि꣢ ॥१७१३॥

Mantra without Swara
स नो मित्रमहस्त्वमग्ने शुक्रेण शोचिषा । देवैरा सत्सि बर्हिषि ॥

सः । नः । मित्रमहः । मित्र । महः । त्वम् । अग्ने । शुक्रेण । शोचिषा । देवैः । आ । सत्सि । बर्हिषि ॥१७१३॥

Samveda - Mantra Number : 1713
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
(मित्रमहः) जिसका तेज हमारा मित्र बनता है ऐसे, हे (अग्ने) अग्रनायक परमेश ! (सः) वह (नः) हमारे सखा (त्वम्) आप जगदीश (शुक्रेण) पवित्र (शोचिषा) ज्योति के साथ और (देवैः) दिव्य गुणों के साथ (बर्हिषि) हमारे हृदयान्तरिक्ष में (आ सत्सि) आकर बैठो ॥३॥
Essence
परमात्मा की उपासना से मनुष्य प्रकाश को और दिव्य गुणों को प्राप्त कर सकते हैं ॥३॥
Subject
अब परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं।