Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 1709

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢ इ꣣दं꣡ प्र꣢तिपप्र꣣थे꣢ य꣣ज्ञ꣢स्य꣣꣬ स्व꣢꣯रुत्ति꣣र꣢न् । ऋ꣣तू꣡नुत्सृ꣢꣯जते व꣣शी꣢ ॥१७०९

यः꣢ । इ꣡द꣢म् । प्र꣣तिपप्रथे꣢ । प्र꣣ति । पप्रथे꣢ । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ । स्वः꣡ । उ꣣त्तिर꣢न् । उ꣣त् । तिर꣢न् । ऋ꣣तू꣢न् । उत् । सृ꣣जते । वशी꣢ ॥१७०९॥

Mantra without Swara
य इदं प्रतिपप्रथे यज्ञस्य स्वरुत्तिरन् । ऋतूनुत्सृजते वशी ॥१७०९

यः । इदम् । प्रतिपप्रथे । प्रति । पप्रथे । यज्ञस्य । स्वः । उत्तिरन् । उत् । तिरन् । ऋतून् । उत् । सृजते । वशी ॥१७०९॥

Samveda - Mantra Number : 1709
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 4;

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो जगदीश्वर (इदम्) इस ब्रह्माण्ड को (प्रतिपप्रथे) फैलाता है और (यज्ञस्य) प्रकाश प्रदाता सूर्य के (स्वः) प्रकाश को (उत्तिरन्) बिखेरता हुआ, (वशी) जगत् की व्यवस्था को चाहता हुआ (ऋतून) वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा आदि ऋतुओं को (उत्सृजते) रचता है, उस जगदीश्वर से हम [‘अजस्रं घर्मम् ईमहे’] अक्षय प्रताप वा तेज माँगते हैं। [यहाँ ‘अजस्रं घर्मम् ईमहे’ यह अंश वाक्यपूर्ति के लिए पूर्व मन्त्र से लाया गया है] ॥२॥
Essence
अहो ! जगत्पति की यह कैसी अद्भुत महिमा है कि वह सूर्य को उत्पन्न करके उसके द्वारा सारे सौरमण्डल को भली-भाँति सञ्चालित कर रहा है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में जगदीश्वर का कर्तृत्व वर्णित है।