Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 1707

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢ उ꣣ग्र꣡ इ꣢व शर्य꣣हा꣢ ति꣣ग्म꣡शृ꣢ङ्गो꣣ न꣡ वꣳस꣢꣯गः । अ꣢ग्ने꣣ पु꣡रो꣢ रु꣣रो꣡जि꣢थ ॥१७०७॥

यः꣢ । उ꣡ग्रः꣢ । इ꣣व । शर्यहा꣢ । श꣣र्य । हा꣢ । ति꣣ग्म꣡शृ꣢ङ्गः । ति꣣ग्म꣢ । शृ꣣ङ्गः । न꣡ । व꣡ꣳस꣢꣯गः । अ꣡ग्ने꣢꣯ । पु꣡रः꣢꣯ । रु꣣रो꣡जि꣢थ ॥१७०७॥

Mantra without Swara
य उग्र इव शर्यहा तिग्मशृङ्गो न वꣳसगः । अग्ने पुरो रुरोजिथ ॥

यः । उग्रः । इव । शर्यहा । शर्य । हा । तिग्मशृङ्गः । तिग्म । शृङ्गः । न । वꣳसगः । अग्ने । पुरः । रुरोजिथ ॥१७०७॥

Samveda - Mantra Number : 1707
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 4;

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्रनायक, तेजस्वी जगदीश ! (यः) जो आप (उग्रः इव) प्रचण्ड धनुर्धारी के समान (शर्यहा) वध करने योग्य काम, क्रोध आदि शत्रुओं के और व्याधि, स्त्यान आदि योग-विघ्नों के विनाशक, (तिग्मश्रृङ्गः न) तीक्ष्ण किरणोंवाले सूर्य के समान (वंसगः) चारु गतिवाले तथा सेवनीय होते हुए (पुरः) शत्रु की नगरियों वा किलेबन्दियों को (रुरोजिथ) तोड़-फोड़ डालते हो, ऐसी आपकी शरण में हम पहुँचते हैं ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
Essence
परमेश्वर की उपासना से बल पाकर मनुष्य सब आन्तरिक शत्रुओं तथा योग के विघ्नों को पराजित करके लक्ष्य के प्रति जागरूक होता हुआ अभ्युदय और निःश्रेयस प्राप्त कर लेता है ॥३॥
Subject
अब वह परमेश्वर कैसा है, जिसकी शरण में हम जाएँ, यह कहते हैं।