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Samveda Mantra 1706

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ च्छा꣣या꣡मि꣢व꣣ घृ꣢णे꣣र꣡ग꣢न्म꣣ श꣡र्म꣢ ते व꣣य꣢म् । अ꣢ग्ने꣣ हि꣡र꣢ण्यसन्दृशः ॥१७०६॥

उ꣡प꣢꣯ । छा꣡या꣢म् । इ꣣व । घृ꣡णेः꣢꣯ । अ꣡ग꣢꣯न्म । श꣡र्म꣢꣯ । ते꣣ । वय꣢म् । अ꣡ग्ने꣢꣯ । हि꣡र꣢꣯ण्यसन्दृशः । हि꣡र꣢꣯ण्य । स꣣न्दृशः ॥१७०६॥

Mantra without Swara
उप च्छायामिव घृणेरगन्म शर्म ते वयम् । अग्ने हिरण्यसन्दृशः ॥

उप । छायाम् । इव । घृणेः । अगन्म । शर्म । ते । वयम् । अग्ने । हिरण्यसन्दृशः । हिरण्य । सन्दृशः ॥१७०६॥

Samveda - Mantra Number : 1706
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 4;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्रनायक, सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर ! (वयम्) हम आपके उपासक (हिरण्यसंदृशः) सोने के समान रमणीय (ते) आपकी (शर्म) शरण में (अगन्म) पहुँच गये हैं, (घृणेः) सूर्य के ताप से हटकर (छायाम् इव) जैसे छाया में पहुँचते हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२
Essence
जैसे सूर्य की धूप से तपे हुए सिरवाला, पसीने से तर-बतर शरीरवाला, गर्मी से व्याकुल कोई मनुष्य विश्राम के लिए वृक्ष आदि की छाया का आश्रय लेता है, वैसे ही आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक विविध कष्टों से व्याकुल लोग विश्राम पाने के उद्देश्य से यदि परमात्मा की शरण में पहुँचते हैं, तो वे सब दुःखों से छूटकर अत्यन्त आनन्दवान् हो जाते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा को कहते हैं।