Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 1702

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- विश्वामित्रः प्रागाथः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तो꣣शा꣡ वृ꣢त्र꣣ह꣡णा꣢ हुवे स꣣जि꣢त्वा꣣ना꣡प꣢राजिता । इ꣣न्द्राग्नी꣡ वा꣢ज꣣सा꣡त꣢मा ॥१७०२॥

तो꣣शा꣢ । वृ꣣त्रह꣡णा꣢ । वृ꣣त्र । ह꣡ना꣢꣯ । हु꣣वे । सजि꣡त्वा꣢ना । स꣣ । जि꣡त्वा꣢꣯ना । अ꣡प꣢꣯राजिता । अ । प꣢राजिता । इन्द्राग्नी꣢ । इ꣣न्द्र । अग्नी꣡इति꣢ । वा꣣जसा꣡त꣢मा ॥१७०२॥

Mantra without Swara
तोशा वृत्रहणा हुवे सजित्वानापराजिता । इन्द्राग्नी वाजसातमा ॥

तोशा । वृत्रहणा । वृत्र । हना । हुवे । सजित्वाना । स । जित्वाना । अपराजिता । अ । पराजिता । इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । वाजसातमा ॥१७०२॥

Samveda - Mantra Number : 1702
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 4;

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(तोशा) तेजस्वी वा बढ़ानेवाले, (वृत्रहणा) पाप को नष्ट करनेवाले, (सजित्वाना) साथ मिलकर विजय लाभ करनेवाले, (अपराजिता) पराजित न होनेवाले, (वाजसातमा) बल के अतिशय दाता (इन्द्राग्नी) ब्रह्म और क्षत्र को, मैं (हुवे) बुलाता हूँ ॥१॥
Essence
समष्टि रूप से राष्ट्र में और व्यष्टि रूप से व्यक्ति में विद्यमान, प्रवृद्ध, ब्रह्मबल और क्षात्रबल से राष्ट्र तथा मनुष्य बाह्य और आन्तरिक शत्रुओं को पराजित करके सदा विजयी होता है ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में इन्द्र-अग्नि नाम से ब्रह्म-क्षत्र की प्रशंसा करते हैं।