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Samveda Mantra 1699

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- निध्रुविः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢माना असृक्षत꣣ सो꣡माः꣢ शु꣣क्रा꣢स꣣ इ꣡न्द꣢वः । अ꣣भि꣡ विश्वा꣢꣯नि꣣ का꣡व्या꣢ ॥१६९९॥

प꣡व꣢꣯मानाः । अ꣣सृक्षत । सो꣡माः꣢꣯ । शु꣣क्रा꣡सः꣢ । इ꣡न्द꣢꣯वः । अ꣣भि꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯नि । का꣡व्या꣢꣯ ॥१६९९॥

Mantra without Swara
पवमाना असृक्षत सोमाः शुक्रास इन्दवः । अभि विश्वानि काव्या ॥

पवमानाः । असृक्षत । सोमाः । शुक्रासः । इन्दवः । अभि । विश्वानि । काव्या ॥१६९९॥

Samveda - Mantra Number : 1699
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 4;

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Meaning
(पवमानाः) स्वयं को तथा दूसरों को पवित्र करते हुए, (शुक्रासः)तेजस्वी, (इन्दवः) अपने काव्य-रस से सहृदयों को भिगोनेवाले(सोमाः) शान्त विद्वान् कविजन ही (विश्वानि काव्या) सब भक्तिरस के काव्यों की (असृक्षत) सर्जना करते हैं ॥१॥
Essence
भगवान् के उपासक कविजन ही भक्तिरस के काव्यों की सर्जना में समर्थ होते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में कविकर्म का वर्णन है।

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