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Samveda Mantra 1694

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- विश्वामित्रः प्रागाथः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ अ꣡प꣢स꣣स्प꣢꣫र्युप꣣ प्र꣡ य꣢न्ति धी꣣त꣡यः꣢ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ प꣣थ्या꣢३ अ꣡नु꣢ ॥१६९४॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । अ꣡प꣢꣯सः । प꣡रि꣢꣯ । उ꣡प꣢꣯ । प्र । य꣣न्ति । धीत꣡यः । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । प꣣थ्याः꣢ । अ꣡नु꣢꣯ ॥१६९४॥

Mantra without Swara
इन्द्राग्नी अपसस्पर्युप प्र यन्ति धीतयः । ऋतस्य पथ्या३ अनु ॥

इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । अपसः । परि । उप । प्र । यन्ति । धीतयः । ऋतस्य । पथ्याः । अनु ॥१६९४॥

Samveda - Mantra Number : 1694
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 3;

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Meaning
हे (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन ! (धीतयः) ज्ञान (अपसः परि) कर्मों में ही (उप प्रयन्ति) परिसमाप्त हुआ करते हैं। अतः तुम दोनों(ऋतस्य) सत्य कर्म के (पथ्याः) मार्गों का (अनु) अनुसरण करो ॥२॥
Essence
कर्महीन अकेले ज्ञान शोभा नहीं पाते ॥२॥
Subject
द्वितीय ऋचा की व्याख्या उत्तरार्चिक में १५७७ क्रमाङ्क पर जीवात्मा और परमात्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ आत्मा और मन का विषय वर्णित है।

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