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Samveda Mantra 1683

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
म꣣घो꣡नः꣢ स्म वृत्र꣣ह꣡त्ये꣢षु चोदय꣣ ये꣡ दद꣢꣯ति प्रि꣣या꣡ वसु꣢꣯ । त꣢व꣣ प्र꣡णी꣢ती हर्यश्व सू꣣रि꣢भि꣣र्वि꣡श्वा꣢ तरेम दुरि꣣ता꣢ ॥१६८३॥

म꣣घो꣡नः꣢ । स्म꣣ । वृत्रह꣡त्ये꣢षु । वृ꣣त्र । ह꣡त्ये꣢꣯षु । चो꣣दय । ये꣢ । द꣡द꣢꣯ति । प्रि꣣या꣢ । व꣡सु꣢꣯ । त꣡व꣢꣯ । प्र꣡णी꣢꣯ती । प्र । नी꣡ती । हर्यश्व । हरि । अश्व । सूरि꣡भिः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । त꣣रेम । दुरिता꣢ । दुः꣣ । इता꣢ ॥१६८३॥

Mantra without Swara
मघोनः स्म वृत्रहत्येषु चोदय ये ददति प्रिया वसु । तव प्रणीती हर्यश्व सूरिभिर्विश्वा तरेम दुरिता ॥

मघोनः । स्म । वृत्रहत्येषु । वृत्र । हत्येषु । चोदय । ये । ददति । प्रिया । वसु । तव । प्रणीती । प्र । नीती । हर्यश्व । हरि । अश्व । सूरिभिः । विश्वा । तरेम । दुरिता । दुः । इता ॥१६८३॥

Samveda - Mantra Number : 1683
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (हर्यश्व) परस्पर आकर्षण से युक्त व्याप्त सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि लोकों के स्वामी जगदीश्वर ! आप (मघोनः) धनी मनुष्यों को (वृत्रहत्येषु) जिनमें पापों वा पापी दुष्ट शत्रुओं की हत्या की जाती है, ऐसे देवासुरसङ्ग्रामों में (चोदय) प्रेरित करो, (ये) जो धनी मनुष्य (प्रिया वसु) प्रिय धनों को (ददति) परोपकार के लिए दान करते हैं। (तव प्रणीती) आपके श्रेष्ठ मार्गदर्शन से, हम (सुरिभिः) विद्वान् स्तोताओं सहित (विश्वा दुरिता) सब दुःख, दुर्गुण, दुर्व्यसन आदि को (तरेम) तर जाएँ ॥२॥
Essence
व्यक्तियों तथा समाज की उन्नति के लिए धन और दान के साथ पापों का संहार तथा विघ्नों पर विजय भी अपेक्षित होती है ॥२॥ इस खण्ड में परमात्मा, मन और श्रद्धा के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ अठारहवें अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा से प्रार्थना करते हैं।