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Samveda Mantra 1681

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अम्बरीषो वार्षागिर ऋजिश्वा भारद्वाजश्च Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प꣢रि꣣ त्य꣡ꣳ ह꣢र्य꣣त꣡ꣳ हरिं꣢꣯ ब꣣भ्रुं꣡ पु꣢नन्ति꣣ वा꣡रे꣢ण । यो꣢ दे꣣वा꣢꣫न्विश्वाँ꣣ इ꣢꣯त्परि꣣ म꣡दे꣢न स꣣ह गच्छ꣢꣯ति ॥१६८१॥

प꣡रि꣢꣯ । त्यम् । ह꣣र्यत꣢म् । ह꣡रि꣢꣯म् । ब꣣भ्रु꣢म् । पु꣣नन्ति । वा꣡रे꣢꣯ण । यः । दे꣣वा꣢न् । वि꣡श्वा꣢꣯न् । इ꣣त् । प꣡रि꣢꣯ । म꣡दे꣢꣯न । स꣣ह꣢ । ग꣡च्छ꣢꣯ति ॥१६८१॥

Mantra without Swara
परि त्यꣳ हर्यतꣳ हरिं बभ्रुं पुनन्ति वारेण । यो देवान्विश्वाँ इत्परि मदेन सह गच्छति ॥

परि । त्यम् । हर्यतम् । हरिम् । बभ्रुम् । पुनन्ति । वारेण । यः । देवान् । विश्वान् । इत् । परि । मदेन । सह । गच्छति ॥१६८१॥

Samveda - Mantra Number : 1681
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 2;

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Meaning
योगाभ्यासी लोग (त्यम्) उस (हर्यतम्) चाहने योग्य, (बभ्रुम्) इन्द्रियों को विषय ग्रहण में सहायता देनेवाले, (हरिम्) ज्ञान के ग्रहण में साधनभूत मन को (वारेण) अशुद्धि-निवारक योगानुष्ठान से (परि पुनन्ति) पवित्र करते हैं, (यः) जो मन (मदेन सह) उत्साह के साथ (विश्वान् देवान् इत्) सभी इन्द्रियों में (परि गच्छति) उन-उनके विषय को ग्रहण कराने के लिए परिव्याप्त होता है, [क्योंकि मन का व्यापार न हो तो इन्द्रियां विषय को ग्रहण नहीं कर सकतीं] ॥३॥
Essence
मनुष्यों का मन यदि दूषित हो तो वह इन्द्रियों को कुमार्ग पर ही ले जाता है। इसलिए अध्यात्म-जीवन के लिए और परमात्मा के दर्शन के लिए उसका शोधन अत्यन्त आवश्यक है ॥३॥
Subject
तृतीय ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ५५२ क्रमाङ्क पर जीवात्मा की शुद्धि के विषय में और उत्तरार्चिक में १३२९ क्रमाङ्क पर गुरु-शिष्य के विषय में हो चुकी है। यहाँ मन की शुद्धि का विषय कहते हैं।

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