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Samveda Mantra 168

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रियमेधः आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ प्र गोप꣢꣯तिं गि꣣रे꣡न्द्र꣢मर्च꣣ य꣡था꣢ वि꣣दे꣢ । सू꣣नु꣢ꣳ स꣣त्य꣢स्य꣣ स꣡त्प꣢तिम् ॥१६८॥

अ꣣भि꣢ । प्र । गो꣡प꣢꣯तिम् । गो꣢ । प꣣तिम् । गिरा꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣र्च । य꣡था꣢꣯ । वि꣣दे꣢ । सू꣣नु꣢म् । स꣣त्य꣡स्य꣣ । स꣡त्प꣢꣯तिम् । सत् । प꣣तिम् ॥१६८॥

Mantra without Swara
अभि प्र गोपतिं गिरेन्द्रमर्च यथा विदे । सूनुꣳ सत्यस्य सत्पतिम् ॥

अभि । प्र । गोपतिम् । गो । पतिम् । गिरा । इन्द्रम् । अर्च । यथा । विदे । सूनुम् । सत्यस्य । सत्पतिम् । सत् । पतिम् ॥१६८॥

Samveda - Mantra Number : 168
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

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Meaning
हे मनुष्य ! तू (गोपतिम्) सूर्य, पृथिवी आदि लोकों के अथवा राष्ट्रभूमि के स्वामी और पालनकर्ता, (सत्यस्य सूनुम्) सत्य ज्ञान और सत्य कर्म के प्रेरक, (सत्पतिम्) सज्जनों के रक्षक एवं दुष्टों को दण्ड देनेवाले (इन्द्रम्) परमात्मा और राजा को (अभि) लक्ष्य करके (गिरा) वाणी से (प्र अर्च) भली-भाँति स्तुति कर अर्थात् इनके गुण-कर्मों का वर्णन कर, (यथा) जैसे वे (विदे) उस स्तुति को जान लें ॥४॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥४॥
Essence
मनुष्यों को योग्य है कि वे विविध गुणगणों से विभूषित परमेश्वर और राजा को लक्ष्य करके उनके यथार्थ गुण-कर्म-स्वभावों का ऐसा वर्णन करें कि वे उसे जान लें, क्योंकि स्तोतव्य की स्तुति तभी फलदायक होती है जब वह उसके अन्तःकरण को छू लेती है ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में मनुष्य को प्रेरणा की गयी है।