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Samveda Mantra 1679

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अम्बरीषो वार्षागिर ऋजिश्वा भारद्वाजश्च Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢य सोम꣣ पा꣡त꣢वे वृत्र꣣घ्ने꣡ परि꣢꣯ षिच्यसे । न꣡रे꣢ च꣣ द꣡क्षि꣢णावते वी꣣रा꣡य꣢ सदना꣣स꣡दे꣢ ॥१६७९॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯य । सो꣣म । पा꣡त꣢꣯वे । वृ꣣त्रघ्ने꣡ । वृ꣣त्र । घ्ने꣣ । प꣡रि꣢꣯ । सि꣣च्यसे । न꣡रे꣢꣯ । च꣣ । द꣡क्षि꣢꣯णावते । वी꣣रा꣡य꣣ । स꣣दनास꣡दे꣢ । स꣣दन । स꣡दे꣢꣯ ॥१६७९॥

Mantra without Swara
इन्द्राय सोम पातवे वृत्रघ्ने परि षिच्यसे । नरे च दक्षिणावते वीराय सदनासदे ॥

इन्द्राय । सोम । पातवे । वृत्रघ्ने । वृत्र । घ्ने । परि । सिच्यसे । नरे । च । दक्षिणावते । वीराय । सदनासदे । सदन । सदे ॥१६७९॥

Samveda - Mantra Number : 1679
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सोम) मेरे भक्तिरस ! तू (वृत्रघ्ने) पाप-विनाशक, (दक्षिणावते) दानी, (वीराय) काम आदि षड़् रिपुओं को विशेष रूप से कम्पायमान करनेवाले, (सदनासदे) हृदय-सदन में स्थित (नरे च) और नेतृत्व करनेवाले (इन्द्राय) जगदीश्वर के (पातवे) पान करने के लिए (परिषिच्यसे) प्रवाहित किया जा रहा है ॥१॥
Essence
परमात्मा के भक्त लोग पाप-कर्मों का परित्याग करके, प्रचुर ऐश्वर्य प्राप्त करके सब आन्तरिक और बाह्य विघ्नों को नष्ट करने में समर्थ हो जाते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या उत्तरार्चिक में १३३१ क्रमाङ्क पर गुरु-शिष्य विषय में हो चुकी है। यहाँ परमात्मा की भक्ति का विषय वर्णित है।