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Samveda Mantra 1668

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
कु꣣वि꣡त्स꣢स्य꣣ प्र꣢꣫ हि व्र꣣जं꣡ गोम꣢꣯न्तं दस्यु꣣हा꣡ गम꣢꣯त् । श꣡ची꣢भि꣣र꣡प꣢ नो वरत् ॥१६६८॥

कु꣣वि꣢त्सस्य । कु꣣वि꣢त् । स꣣स्य । प्र꣢ । हि । व्र꣡ज꣢म् । गो꣡म꣢꣯न्तम् । द꣣स्युहा꣢ । द꣣स्यु । हा꣢ । ग꣡म꣢꣯त् । श꣡ची꣢꣯भिः । अ꣡प꣢꣯ । नः꣣ । वरत् ॥१६६८॥

Mantra without Swara
कुवित्सस्य प्र हि व्रजं गोमन्तं दस्युहा गमत् । शचीभिरप नो वरत् ॥

कुवित्सस्य । कुवित् । सस्य । प्र । हि । व्रजम् । गोमन्तम् । दस्युहा । दस्यु । हा । गमत् । शचीभिः । अप । नः । वरत् ॥१६६८॥

Samveda - Mantra Number : 1668
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

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Meaning
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। जो (दस्युहा) विघ्नों का विनाशक इन्द्र जगदीश्वर (कुवित्सस्य) बहुत दान देनेवाले को (गोमन्तं व्रजम्) उत्कृष्ट धेनुओं से युक्त गोशाला वा अध्यात्म-प्रकाश का समूह (प्र गमत्) प्राप्त कराता है, वह (शचीभिः) अपने कर्मों से (नः) हमारे लिए भी (अप वरत्) गाय आदि धनों वा अध्यात्म-प्रकाशों का द्वार खोल दे ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (दस्युहा) दुष्टों का वधकर्ता इन्द्र राजा (कुवित्सस्य) गोघातक की (गोमन्तं व्रजम्) धेनुओं से युक्त गोशाला में (प्र गमत् हि) पहुँचे और (शचीभिः) अपनी सेनाओं से, उसकी गौओं को (नः) हम धार्मिकों के लिए (अप वरत्) छीन लाये ॥३॥
Essence
परमात्मा दानियों का ही सहायक होता है। दुष्ट गोहत्यारों को यही दण्ड है कि उनकी गौएँ छीनकर सज्जनों को भेंट कर दी जाएँ ॥३॥ इस खण्ड में ज्ञानरस, जगदीश्वर, जीवात्मा और राजा के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ अठारहवें अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा तथा राजा का विषय कहा गया है।

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