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Samveda Mantra 1663

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ज꣡रा꣢बोध꣣ त꣡द्वि꣢विड्ढि वि꣣शे꣡वि꣢शे य꣣ज्ञि꣡या꣢य । स्तो꣡म꣢ꣳ रु꣣द्रा꣡य꣢ दृशी꣣क꣢म् ॥१६६३॥

ज꣡रा꣢꣯बोध । ज꣡रा꣢꣯ । बो꣣ध । त꣢त् । वि꣣विड्ढि । विशे꣡वि꣢शे । वि꣣शे꣢ । वि꣣शे । यज्ञि꣡या꣢य । स्तो꣡म꣢꣯म् । रु꣢द्रा꣡य꣢ । दृ꣣शीक꣢म् ॥१६६३॥

Mantra without Swara
जराबोध तद्विविड्ढि विशेविशे यज्ञियाय । स्तोमꣳ रुद्राय दृशीकम् ॥

जराबोध । जरा । बोध । तत् । विविड्ढि । विशेविशे । विशे । विशे । यज्ञियाय । स्तोमम् । रुद्राय । दृशीकम् ॥१६६३॥

Samveda - Mantra Number : 1663
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (जराबोध) स्तुतिविज्ञ मानव ! तू (विशे विशे) प्रत्येक मनुष्य के हितार्थ (यज्ञियाय) पूजनीय (रुद्राय) दुःखहर्ता परमात्मा के लिए (तत्) उस उज्ज्वल (दृशीकम्) रमणीय(स्तोमम्) स्तोत्र को, गुण-गान को (विविड्ढि) कर ॥१॥
Essence
सब मनुष्यों को चाहिए कि जगदीश्वर का गुणगान करके यथाशक्ति उसके गुणों को अपने अन्दर धारण करने का प्रयत्न करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में १५ क्रमाङ्क पर परमात्मा की स्तुति के विषय में की गयी थी। यहाँ भी वही विषय कहा जा रहा है।