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Samveda Mantra 1660

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ त्वा꣢ विश꣣न्त्वि꣡न्द꣢वः समु꣣द्र꣡मि꣢व꣣ सि꣡न्ध꣢वः । न꣢꣫ त्वामि꣣न्द्रा꣡ति꣢ रिच्यते ॥१६६०॥

आ꣢ । त्वा꣣ । विशन्तु । इ꣡न्द꣢꣯वः । स꣣मुद्र꣢म् । स꣣म् । उद्र꣢म् । इ꣢व । सि꣡न्ध꣢꣯वः । न । त्वाम् । इ꣣न्द्र । अ꣡ति꣢꣯ । रि꣣च्यते ॥१६६०॥

Mantra without Swara
आ त्वा विशन्त्विन्दवः समुद्रमिव सिन्धवः । न त्वामिन्द्राति रिच्यते ॥

आ । त्वा । विशन्तु । इन्दवः । समुद्रम् । सम् । उद्रम् । इव । सिन्धवः । न । त्वाम् । इन्द्र । अति । रिच्यते ॥१६६०॥

Samveda - Mantra Number : 1660
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

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Meaning
हे (इन्द्र) जीवात्मन् ! (इन्दवः) आचार्य से प्राप्त ज्ञान-रस और परमात्मा से प्राप्त आनन्द-रस (त्वा) तुझमें (आ विशन्तु) प्रवेश करें, (समुद्रम् इव) समुद्र में जैसे (सिन्धवः) नदियाँ प्रवेश करती हैं। देह में कोई भी मन, प्राण आदि (त्वाम्) तुझ जीवात्मा से (न अतिरिच्यते) महत्ता में अधिक नहीं है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
जीवात्मा शरीर का सम्राट् है। मन, बुद्धि, प्राण, मस्तिष्क,हृदय आदि सब उसी के अनुशासन में है। वह यदि जागरूक है, तो सारे अभ्युदय या निःश्रेयस को वह प्राप्त कर सकता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में १९७ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में हो चुकी है। यहाँ जीवात्मा का विषय कहते हैं।

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