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Samveda Mantra 1648

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न꣡म꣢स्ते अग्न꣣ ओ꣡ज꣢से गृ꣣ण꣡न्ति꣢ देव कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ । अ꣡मै꣢र꣣मि꣡त्र꣢मर्दय ॥१६४८॥

न꣡मः꣢꣯ । ते꣣ । अग्ने । ओ꣡ज꣢꣯से । गृ꣣ण꣡न्ति꣢ । दे꣣व । कृष्ट꣡यः꣢ । अ꣡मैः꣢꣯ । अ꣣मि꣡त्र꣢म् । अ꣣ । मि꣡त्र꣢꣯म् । अ꣣र्द꣡य ॥१६४८॥

Mantra without Swara
नमस्ते अग्न ओजसे गृणन्ति देव कृष्टयः । अमैरमित्रमर्दय ॥

नमः । ते । अग्ने । ओजसे । गृणन्ति । देव । कृष्टयः । अमैः । अमित्रम् । अ । मित्रम् । अर्दय ॥१६४८॥

Samveda - Mantra Number : 1648
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 4;

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Meaning
हे (देव) दान आदि गुणों से युक्त (अग्ने) अग्रनायक परमात्मन्,राजन् वा योगिराज ! (ते ओजसे) तुम्हारे बल और प्रताप के लिए(कृष्टयः) मनुष्य (नमः गृणन्ति) नमस्कार करते हैं अर्थात् तुम्हारे बल और प्रताप की प्रशंसा करते हैं। तुम (अमैः) अपने बलों से(अमित्रम्) योग-मार्ग वा जीवन-मार्ग में आते हुए शत्रु को (अर्दय) पीड़ित कर डालो ॥१॥
Essence
पग-पग पर हमारे निर्धारित लक्ष्य में जो विघ्न आते हैं, वे परमेश्वर की प्रेरणा से, राजा की सहायता से और योग-प्रशिक्षक के योग्य प्रशिक्षण से सरलतापूर्वक दूर किये जा सकते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ११ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ परमात्मा, राजा और योगिराज को सम्बोधन है।

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