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Samveda Mantra 1647

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त्वां꣡ विष्णु꣢꣯र्बृ꣣ह꣡न्क्षयो꣢꣯ मि꣣त्रो꣡ गृ꣢णाति꣣ व꣡रु꣢णः । त्वा꣡ꣳ शर्धो꣢꣯ मद꣣त्य꣢नु꣣ मा꣡रु꣢तम् ॥१६४७॥

त्वा꣢म् । वि꣡ष्णुः꣢꣯ । बृ꣡ह꣢न् । क्ष꣡यः꣢꣯ । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । गृ꣣णाति । व꣡रु꣢꣯णः । त्वाम् । श꣡र्धः꣢꣯ । म꣣दति । अ꣡नु꣢꣯ । मा꣡रु꣢꣯तम् ॥१६४७॥

Mantra without Swara
त्वां विष्णुर्बृहन्क्षयो मित्रो गृणाति वरुणः । त्वाꣳ शर्धो मदत्यनु मारुतम् ॥

त्वाम् । विष्णुः । बृहन् । क्षयः । मित्रः । मि । त्रः । गृणाति । वरुणः । त्वाम् । शर्धः । मदति । अनु । मारुतम् ॥१६४७॥

Samveda - Mantra Number : 1647
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 3;

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Meaning
हे इन्द्र ! हे परम सम्राट् जगदीश ! (त्वाम्) आप महाबली की (विष्णुः) किरणों से व्याप्त सूर्य (बृहन् क्षयः) विस्तीर्ण अन्तरिक्षरूप घर, (मित्रः) वायु और (वरुणः) अग्नि(गृणाति) स्तुति कर रहे हैं। (मारुतं शर्धः) मानसून पवनों की सेना भी (त्वाम् अनु) आपकी ही अनुकूलता होने पर(मदति) हर्ष को प्राप्त करती है ॥३॥
Essence
संसार में जो कोई भी पदार्थ अपना-अपना कार्य करते हैं, वे सभी परमेश्वर से ही शक्ति पाते हैं ॥३॥ इस खण्ड में जीवात्मा और परमात्मा के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ सत्रहवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
Subject
आगे फिर उसी विषय का वर्णन है।

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