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Samveda Mantra 1642

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्य꣡मु꣢ वः सत्रा꣣सा꣢हं꣣ वि꣡श्वा꣢सु गी꣣र्ष्वा꣡य꣢तम् । आ꣡ च्या꣢वयस्यू꣣त꣡ये꣢ ॥१६४२॥

त्य꣢म् । उ꣣ । वः । सत्रासा꣡ह꣢म् । स꣣त्रा । सा꣡ह꣢म् । वि꣡श्वा꣢꣯सु । गी꣣र्षु꣢ । आ꣡य꣢꣯तम् । आ । य꣣तम् । आ । च्या꣣वयसि । ऊत꣡ये꣢ ॥१६४२॥

Mantra without Swara
त्यमु वः सत्रासाहं विश्वासु गीर्ष्वायतम् । आ च्यावयस्यूतये ॥

त्यम् । उ । वः । सत्रासाहम् । सत्रा । साहम् । विश्वासु । गीर्षु । आयतम् । आ । यतम् । आ । च्यावयसि । ऊतये ॥१६४२॥

Samveda - Mantra Number : 1642
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 3;

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Meaning
हे भाई ! तू (त्यम् उ) उसी (सत्रासाहम्) एक साथ सब विघ्नों को पराजित कर देनेवाले, (विश्वासु गीर्षु) सब वाङ्मयों में (आयतम्) व्याप्त परमात्मा वा जीवात्मा को (वः) वरण कर और (ऊतये) रक्षा के लिए (आच्यावयसि) अपनी ओर झुका ॥१॥
Essence
जगदीश्वर सब वेद-वाणियों में व्याप्त है, क्योंकि श्रुति कहती है कि ‘जिसने उसे नहीं जाना, वह ऋचा से भला क्या लाभ उठा सकेगा (ऋ० १।१६४।३९)’। जीवात्मा का भी वेदादि वाणियाँ पद-पद पर वर्णन करती हैं। परमात्मा की शरण में जाकर और अपने अन्तरात्मा को भली-भाँति उद्बोधन देकर मनुष्य रक्षित तथा समुन्नत हो सकते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में १७० क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ परमात्मा और जीवात्मा का विषय कहते हैं।

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