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Samveda Mantra 1639

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣣ज्ञ꣡ इन्द्र꣢꣯मवर्धय꣣द्य꣢꣯द्भूमिं꣣ व्य꣡व꣢र्तयत् । च꣣क्राण꣡ ओ꣢प꣣शं꣢ दि꣣वि꣢ ॥१६३९॥

य꣣ज्ञः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣वर्धयत् । य꣢त् । भू꣡मि꣢꣯म् । व्य꣡व꣢꣯र्तयत् । वि । अ꣡व꣢꣯र्तयत् । च꣣क्राणः꣢ । ओ꣣पश꣢म् । ओ꣣प । श꣢म् । दि꣣वि꣢ ॥१६३९॥

Mantra without Swara
यज्ञ इन्द्रमवर्धयद्यद्भूमिं व्यवर्तयत् । चक्राण ओपशं दिवि ॥

यज्ञः । इन्द्रम् । अवर्धयत् । यत् । भूमिम् । व्यवर्तयत् । वि । अवर्तयत् । चक्राणः । ओपशम् । ओप । शम् । दिवि ॥१६३९॥

Samveda - Mantra Number : 1639
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 3;

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Meaning
(यज्ञः) परमात्मा की सङ्गति करना रूप यज्ञ (इन्द्रम्) जीवात्मा को (अवर्धयत्) बढ़ाता है, शक्तिशाली बनाता है, (यत्) क्योंकि, वह जीवात्मा (दिवि) तेजस्वी परमात्मा में (ओपशम्) निवास(चक्राणः) करता हुआ (भूमिम्) पार्थिव शरीर को (व्यवर्तयत्) भली-भाँति चलाता है ॥१॥
Essence
परमात्मा के पास से ही बल प्राप्त करके जीवात्मा शरीररूप राज्य के मस्तिष्क-संस्थान, रक्त-संस्थान, पाचन-संस्थान, श्वास-संस्थान, ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों सबका भली-भाँति सञ्चालन करने में समर्थ होता है। इसलिए उसे चाहिए कि परमात्मा को कभी न भूले ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में १२१ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में की गयी थी। यहाँ जीवात्मा का विषय कहते हैं।

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