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Samveda Mantra 1633

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- रेभसूनू काश्यपौ Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
तं꣡ गाथ꣢꣯या पुरा꣣ण्या꣡ पु꣢ना꣣न꣢म꣣꣬भ्य꣢꣯नूषत । उ꣣तो꣡ कृ꣢पन्त धी꣣त꣡यो꣢ दे꣣वा꣢नां꣣ ना꣢म꣣ बि꣡भ्र꣢तीः ॥१६३३॥

तम् । गा꣡थ꣢꣯या । पु꣡राण्या꣢ । पु꣣नान꣢म् । अ꣣भि꣢ । अ꣣नूषत । उत꣢ । उ꣣ । कृपन्त । धीत꣡यः꣢ । दे꣣वा꣡ना꣢म् । ना꣡म꣢꣯ । बि꣡भ्र꣢꣯तीः ॥१६३३॥

Mantra without Swara
तं गाथया पुराण्या पुनानमभ्यनूषत । उतो कृपन्त धीतयो देवानां नाम बिभ्रतीः ॥

तम् । गाथया । पुराण्या । पुनानम् । अभि । अनूषत । उत । उ । कृपन्त । धीतयः । देवानाम् । नाम । बिभ्रतीः ॥१६३३॥

Samveda - Mantra Number : 1633
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 2;

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Meaning
(पुनानम्) पवित्र करनेवाले (तम्) उस सोम की अर्थात् शुभ गुण-कर्मों की प्रेरणा करनेवाले परमात्मा की, स्तोता लोग(पुराण्या) सनातन (गाथया) वेद-गाथा से (अभ्यनूषत) स्तुति करते हैं। (उत उ) और (नाम) परमात्मा के प्रति नमन को(बिभ्रतीः) धारण करती हुई (देवानाम्) विद्वानों की (धीतयः) बुद्धियाँ और क्रियाएँ (कृपन्त) शक्तिशालिनी हो जाती हैं ॥३॥
Essence
परमात्मा की स्तुति से स्तोताओं की वाणियाँ, प्रज्ञाएँ और क्रियाएँ बलवती होकर जीवन में उन्हें सफल करती हैं ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर की स्तुति और उसके फल का वर्णन है।

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