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Samveda Mantra 1622

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वृ꣡षा꣢ यू꣣थे꣢व꣣ व꣡ꣳस꣢गः कृ꣣ष्टी꣡रि꣢य꣣र्त्यो꣡ज꣢सा । ई꣡शा꣢नो꣣ अ꣡प्र꣢तिष्कुतः ॥१६२२॥

वृ꣡षा꣢꣯ । यू꣣था꣢ । इ꣣व । व꣡ꣳस꣢꣯गः । कृ꣣ष्टीः꣢ । इ꣣यर्ति । ओ꣡ज꣢꣯सा । ई꣡शा꣢꣯नः । अ꣡प्र꣢꣯तिष्कुतः । अ । प्र꣣तिष्कुतः ॥१६२२॥

Mantra without Swara
वृषा यूथेव वꣳसगः कृष्टीरियर्त्योजसा । ईशानो अप्रतिष्कुतः ॥

वृषा । यूथा । इव । वꣳसगः । कृष्टीः । इयर्ति । ओजसा । ईशानः । अप्रतिष्कुतः । अ । प्रतिष्कुतः ॥१६२२॥

Samveda - Mantra Number : 1622
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 1;

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Meaning
(वंसगः) शान से चलनेवाला (वृषा) साँड (यूथा इव) जैसे गौओं के झुण्ड में जाता है, वैसे ही (वृषा) शुभगुणों की वर्षा करनेवाला, (वंसगः) धर्मसेवी के पास जानेवाला (ईशानः) जगदीश्वर (अप्रतिष्कुतः) किसी से न रोका जाता हुआ (ओजसा) बल के साथ (कृष्टीः) उपासक मनुष्यों के पास (इयर्ति) पहुँच जाता है ॥३॥ यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥३॥
Essence
जो श्रद्धा से परमेश्वर की उपासना करते हैं, परमेश्वर भी उन धर्मात्मा लोगों की अवश्य सहायता करता है और उन्हें बल देता है ॥३॥
Subject
अब कैसा परमात्मा किसके समान किन्हें प्राप्त होता है, यह कहते हैं।