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Samveda Mantra 1621

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡ नो꣢ वृषन्न꣣मुं꣢ च꣣रु꣡ꣳ सत्रा꣢꣯दाव꣣न्न꣡पा꣢ वृधि । अ꣣स्म꣢भ्य꣣म꣡प्र꣢तिष्कुतः ॥१६२१॥

सः । नः꣣ । वृषन् । अमु꣢म् । च꣣रु꣢म् । स꣡त्रा꣢꣯दावन् । स꣡त्रा꣢꣯ । दा꣣वन् । अ꣡प꣢꣯ । वृ꣣धि । अस्म꣡भ्य꣢म् । अ꣡प्र꣢꣯तिष्कुतः । अ । प्र꣣तिष्कुतः ॥१६२१॥

Mantra without Swara
स नो वृषन्नमुं चरुꣳ सत्रादावन्नपा वृधि । अस्मभ्यमप्रतिष्कुतः ॥

सः । नः । वृषन् । अमुम् । चरुम् । सत्रादावन् । सत्रा । दावन् । अप । वृधि । अस्मभ्यम् । अप्रतिष्कुतः । अ । प्रतिष्कुतः ॥१६२१॥

Samveda - Mantra Number : 1621
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वृषन्) सुखों की वर्षा करनेवाले, (सत्रादावन्) एक साथ दान देनेवाले, सत्य के प्रेरक वा सृष्टियज्ञ के सम्पादक जगदीश्वर ! (अप्रतिष्कुतः) अविचल (सः) वह आप(अस्मभ्यम्) आपकी आज्ञा में और पुरुषार्थ में वर्तमान हम उपासकों के लिए (अमुं चरुम्) सूर्य के प्रतिबन्धक मेघ के समान इस मोक्षमार्ग में रुकावट डालनेवाले अविद्या, दुराचार आदि को (अपावृधि) दूर कर दो ॥२॥
Essence
जैसे सूर्य अपने प्रकाश के सञ्चार में बाधा डालनेवाले मेघ रूप कपाट को खोलकर भूमण्डल को प्रकाशित करता है, वैसे ही जगदीश्वर हमारे मोक्ष में बाधक अविद्या, दुष्कर्म आदि को हटाकर हमें मोक्ष प्राप्त कराते हैं ॥२॥
Subject
अब परमात्मा से प्रार्थना करते हैं।