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Samveda Mantra 1617

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि꣡श्वे꣢भिरग्ने अ꣣ग्नि꣡भि꣢रि꣣मं꣢ य꣣ज्ञ꣢मि꣣दं꣡ वचः꣢꣯ । च꣡नो꣢ धाः सहसो यहो ॥१६१७॥

वि꣡श्वे꣢꣯भिः । अ꣣ग्ने । अग्नि꣡भिः꣣ । इ꣣म꣢म् । य꣣ज्ञ꣢म् । इ꣣द꣢म् । व꣡चः꣢꣯ । च꣡नः꣢꣯ । धाः꣣ । सहसः । यहो ॥१६१७॥

Mantra without Swara
विश्वेभिरग्ने अग्निभिरिमं यज्ञमिदं वचः । चनो धाः सहसो यहो ॥

विश्वेभिः । अग्ने । अग्निभिः । इमम् । यज्ञम् । इदम् । वचः । चनः । धाः । सहसः । यहो ॥१६१७॥

Samveda - Mantra Number : 1617
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 1;

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Meaning
हे (अग्ने) जगन्नायक परमात्मन् ! आप (विश्वेभिः) सब (अग्निभिः) संकल्प, उत्साह, महत्वाकाञ्क्षा, वीरता आदि की अग्नियों के साथ (इमम्) इस (यज्ञम्) हमारे जीवन यज्ञ में आओ। (इदम्) इस (वचः) वचन को सुनो। हे (सहसः यहो) बल के पुत्र अर्थात् अतिबली परमात्मन् ! आप हमें (चनः) आनन्द का अमृत (धाः) प्रदान करो ॥१॥
Essence
अग्निहीन मनुष्य मृत के तुल्य होता है। इसलिए हृदय में अग्नियों को प्रज्वलित कर आशावाद के साथ कर्मयोग का सहारा लेकर विजयश्री सबको प्राप्त करनी चाहिए ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में परमात्मा से प्रार्थना की गयी है।

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