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Samveda Mantra 1615

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अत्रिर्भौमः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वि꣣पश्चि꣢ते꣣ प꣡व꣢मानाय गायत म꣣ही꣡ न धारात्यन्धो꣢꣯ अर्षति । अ꣢हि꣣र्न꣢ जू꣣र्णा꣡मति꣢꣯ सर्पति꣣ त्व꣢च꣣म꣢त्यो꣣ न꣡ क्रीड꣢꣯न्नसर꣣द्वृ꣢षा꣣ ह꣡रिः꣢ ॥१६१५॥

वि꣣पश्चि꣡ते꣢ । वि꣣पः । चि꣡ते꣢꣯ । प꣡व꣢꣯मानाय । गा꣣यत । मही꣢ । न । धा꣡रा꣢꣯ । अ꣡ति꣢꣯ । अ꣡न्धः꣢꣯ । अ꣣र्षति । अ꣡हिः꣢꣯ । न । जू꣣र्णा꣢म् । अ꣡ति꣢꣯ । स꣣र्पति । त्व꣡च꣢꣯म् । अ꣡त्यः꣢꣯ । न । क्री꣡ड꣢꣯न् । अ꣣सरत् । वृ꣡षा꣢꣯ । ह꣡रिः꣢꣯ ॥१६१५॥

Mantra without Swara
विपश्चिते पवमानाय गायत मही न धारात्यन्धो अर्षति । अहिर्न जूर्णामति सर्पति त्वचमत्यो न क्रीडन्नसरद्वृषा हरिः ॥

विपश्चिते । विपः । चिते । पवमानाय । गायत । मही । न । धारा । अति । अन्धः । अर्षति । अहिः । न । जूर्णाम् । अति । सर्पति । त्वचम् । अत्यः । न । क्रीडन् । असरत् । वृषा । हरिः ॥१६१५॥

Samveda - Mantra Number : 1615
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 4;

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Meaning
हे मनुष्यो ! तुम (विपश्चिते) मेधावान्, (पवमानाय) मन, बुद्धि, इन्द्रियों आदि को पवित्र करनेवाले जीवात्मा के लिए (गायत) गाओ, उसके महत्त्व को वर्णित करो। वह (अन्धः) अन्धेरे को, तमोगुण को (अत्यर्षति) लाँघ जाता है, (मही न धारा) जैसे बड़ी जलधारा मार्ग में आयी हुई शिला आदि की बाधा को लाँघ जाती है। वह जीवात्मा (जूर्णाम्) पुरानी, बूढ़ी (त्वचम्) त्वचा को, त्वचा-युक्त शरीर को (अतिसर्पति) छोड़कर चला जाता है, (अहिः न) जैसे साँप (जूर्णाम्) पुरानी (त्वचम्) केंचुली को (अति सर्पति) छोड़कर चला जाता है। साथ ही (वृषा) बलवान्, (हरिः) शरीर-रथ का वाहक वह जीवात्मा (अत्यः न) रथ में जुड़े घोड़े के समान (क्रीडन्) क्रीड़ा करता हुआ (असरत्) शरीर-रथ को धारण किये हुए चलता है ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
Essence
न जाने कब जीव शरीर को छोड़कर चला जाए। इसलिए शीघ्र ही धर्म- कर्मों में मन लगाना चाहिए, नहीं तो पीछे पछतावा होगा ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में जीवात्मा का वर्णन है।

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