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Samveda Mantra 1607

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेध्यातिथिः काण्वः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
इ꣣मा꣡ उ꣢ त्वा पुरूवसो꣣ गि꣡रो꣢ वर्धन्तु꣣ या꣡ मम꣢꣯ । पा꣣वक꣡व꣢र्णाः꣣ शु꣡च꣢यो विप꣣श्चि꣢तो꣣ऽभि꣡ स्तोमै꣢꣯रनूषत ॥१६०७॥

इ꣣माः꣢ । उ꣣ । त्वा । पुरूवसो । पुरु । वसो । गि꣡रः꣢꣯ । व꣣र्धन्तु । याः꣢ । म꣡म꣢꣯ । पा꣣वक꣡व꣢र्णाः । पा꣣व꣢क । व꣣र्णाः । शु꣡च꣢꣯यः । वि꣣पश्चि꣡तः꣢ । वि꣣पः । चि꣡तः꣢꣯ । अ꣣भि꣢ । स्तो꣡मैः꣢꣯ । अ꣣नूषत ॥१६०७॥

Mantra without Swara
इमा उ त्वा पुरूवसो गिरो वर्धन्तु या मम । पावकवर्णाः शुचयो विपश्चितोऽभि स्तोमैरनूषत ॥

इमाः । उ । त्वा । पुरूवसो । पुरु । वसो । गिरः । वर्धन्तु । याः । मम । पावकवर्णाः । पावक । वर्णाः । शुचयः । विपश्चितः । विपः । चितः । अभि । स्तोमैः । अनूषत ॥१६०७॥

Samveda - Mantra Number : 1607
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 4;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पुरूवसो) बहुत ऐश्वर्य से युक्त परमात्मन् वा बहुत विद्याधन से सम्पन्न आचार्य ! (इमाः उ) ये (याः मम गिरः) जो मेरी वाणियाँ हैं, वे (त्वा) आपको (वर्धन्तु) बढ़ायें अर्थात् आपकी महिमा को प्रकाशित करें। (पावकवर्णाः) अग्नि के समान उज्ज्वल वर्णवाले, तेजस्वी, (शुचयः) पवित्र (विपश्चितः) विद्वान् लोग (स्तोमैः) स्तोत्रों से, आपकी (अभ्यनूषत) स्तुति कर रहे हैं ॥१॥ यहाँ ‘पावकवर्णाः’ में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
जैसे जगदीश्वर वेदज्ञान के प्रदान द्वारा वैसे ही आचार्य वेदादि शास्त्रों के शिक्षण द्वारा सबका उपकार करता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २५० क्रमाङ्क पर परमात्मा को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ एक साथ परमात्मा और आचार्य दोनों को कहते हैं।