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Samveda Mantra 1606

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- देवातिथिः काण्वः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स꣣व्या꣡मनु꣢꣯ स्फि꣣꣬ग्यं꣢꣯ वावसे꣣ वृ꣢षा꣣ न꣢ दा꣣नो꣡ अ꣢स्य रोषति । म꣢ध्वा꣣ सं꣡पृ꣢क्ताः सार꣣घे꣡ण꣢ धे꣣न꣢व꣣स्तू꣢य꣣मे꣢हि꣣ द्र꣢वा꣣ पि꣡ब꣢ ॥१६०६॥

स꣣व्या꣡म् । अ꣡नु꣢꣯ । स्फि꣡ग्य꣢꣯म् । वा꣣वसे । वृ꣡षा꣢꣯ । न । दा꣣नः꣢ । अ꣣स्य । रोषति । म꣡ध्वा꣢꣯ । सं꣡पृ꣢꣯क्ताः । सम् । पृ꣣क्ताः । सारघे꣡ण꣢ । धे꣣न꣡वः꣢ । तू꣡य꣢꣯म् । आ । इ꣣हि । द्र꣡व꣢꣯ । पि꣡ब꣢꣯ ॥१६०६॥

Mantra without Swara
सव्यामनु स्फिग्यं वावसे वृषा न दानो अस्य रोषति । मध्वा संपृक्ताः सारघेण धेनवस्तूयमेहि द्रवा पिब ॥

सव्याम् । अनु । स्फिग्यम् । वावसे । वृषा । न । दानः । अस्य । रोषति । मध्वा । संपृक्ताः । सम् । पृक्ताः । सारघेण । धेनवः । तूयम् । आ । इहि । द्रव । पिब ॥१६०६॥

Samveda - Mantra Number : 1606
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 4;

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Meaning
हे परमात्मा के उपासक ! (वृषा) बलवान् तू (सव्याम्) बायीं (स्फिग्यम्) टाँग को आगे करके और दाहिनी टाँग को पीछे करके (वावसे) दौड़ लगाने के लिए खड़ा रह, अर्थात् सदा विक्रमशील रह। (अस्य) ऐसे विक्रमशील तेरी(दानः) कोई भी हिंसक (न रोषति) हिंसा नहीं कर सकेगा। हे उपासक ! (सारघेण मध्वा) मधुमक्खियों से प्राप्त मधु से (संपृक्ताः) संयुक्त (धेनवः) गोदुग्ध आदि तैयार हैं। तू (तूयम्) शीघ्र (एहि) आ, (द्रव) क्रियाशील हो, (पिब) पान कर ॥२॥
Essence
जैसे दोड़ की प्रतिस्पर्धा में प्रतिस्पर्धी लोग घुटने पर मुड़ी हुई बायीं टाँग को आगे करके और दाहिनी को पीछे करके आकृति-विशेष में दौड़ने के लिए तैयार खड़े रहते हैं, वैसे ही परमेश्वर का उपासक सदा ही पुरुषार्थ के लिए तैयार रहता है। इसलिए उसके रास्ते में कोई बाधा नहीं डाल सकता, प्रत्युत उसका सभी अभिनन्दन करते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा के उपासक को कहते हैं।

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