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Samveda Mantra 1604

1875 Mantra
Devata- अग्निर्हवींषि वा Rishi- हर्यतः प्रागाथः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सि꣣ञ्च꣡न्ति꣢ न꣡म꣢साव꣣ट꣢मु꣣च्चा꣡च꣢क्रं꣣ प꣡रि꣢ज्मानम् । नी꣣ची꣡न꣢वार꣣म꣡क्षि꣢तम् ॥१६०४॥

सि꣣ञ्च꣡न्ति꣢ । न꣡म꣢꣯सा । अ꣣वट꣢म् । उ꣣च्चा꣡च꣢क्रम् । उ꣣च्चा꣢ । च꣣क्रम् । प꣡रि꣢꣯ज्मानम् । प꣡रि꣢꣯ । ज्मा꣣नम् । नीची꣡न꣢वारम् । नी꣣ची꣡न꣢ । वा꣣रम् । अ꣡क्षि꣢꣯तम् । अ । क्षि꣣तम् ॥१६०४॥

Mantra without Swara
सिञ्चन्ति नमसावटमुच्चाचक्रं परिज्मानम् । नीचीनवारमक्षितम् ॥

सिञ्चन्ति । नमसा । अवटम् । उच्चाचक्रम् । उच्चा । चक्रम् । परिज्मानम् । परि । ज्मानम् । नीचीनवारम् । नीचीन । वारम् । अक्षितम् । अ । क्षितम् ॥१६०४॥

Samveda - Mantra Number : 1604
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 3;

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Meaning
परमेश्वर की ही महिमा से सूर्य-किरणें (उच्चाचक्रम्) उच्च विद्युत्-रूप चक्रवाले, (नीचीनवारम्) नीचे की ओर द्वारवाले, (अक्षितम्) अक्षय (अवटम्) मेघ-रूप कुएँ को (परिज्मानम्) भूमि पर चारों ओर फैलाने के लिए (नमसा) बिजली-रूप वज्र से (सिञ्चन्ति) सींचती हैं ॥३॥
Essence
जिस परमेश्वर की व्यवस्था से मेघों का निर्माण होता है और उनसे वर्षा होती है, उसे हृदय में धारण करके योगी लोग धर्ममेघ समाधि को प्राप्त करें ॥३॥ इस खण्ड में परमेश्वर, विद्वान्, सन्तान, आत्मा-बुद्धि, उपासक तथा वृष्टि का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ सोलहवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
Subject
आगे फिर वही विषय है।

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