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Samveda Mantra 1599

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣य꣡मु꣢ ते꣣ स꣡म꣢तसि क꣣पो꣡त꣢ इव गर्भ꣣धि꣢म् । व꣢च꣣स्त꣡च्चि꣢न्न ओहसे ॥१५९९॥

अ꣣य꣢म् । उ꣣ । ते । स꣡म् । अ꣣तसि । कपो꣡तः꣢ । इ꣣व । गर्भधि꣢म् । ग꣣र्भ । धि꣢म् । व꣡चः꣢꣯ । तत् । चि꣣त् । नः । ओहसे ॥१५९९॥

Mantra without Swara
अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम् । वचस्तच्चिन्न ओहसे ॥

अयम् । उ । ते । सम् । अतसि । कपोतः । इव । गर्भधिम् । गर्भ । धिम् । वचः । तत् । चित् । नः । ओहसे ॥१५९९॥

Samveda - Mantra Number : 1599
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
हे उपासक ! (अयम् उ) यह इन्द्र नामक परमेश्वर (ते) तेरा ही है, जिसे तू (समतसि) भली-भाँति प्राप्त करता है। कैसे प्राप्त करता है ? (कपोतः इव) जैसे कबूतर (गर्भधिम्) नन्हे-नन्हे शिशुओं को धारण करनेवाले अपने घोंसले को प्राप्त करता है। (तत् चित्) इस (नः) हमारे (वचः) वचन पर, हे उपासक ! तू (ओहसे) विचार कर ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
परमेश्वर के साथ अन्तरङ्ग सम्बन्ध स्थापित करके उपासक को परमेश्वर के गुण अपने में धारण करने का प्रयत्न करना चाहिए ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में १८३ क्रमाङ्क पर परमेश्वर को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ उपासक को सम्बोधन करते हैं।