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Samveda Mantra 1598

1875 Mantra
Devata- द्यावापृथिव्यौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
म꣣ही꣢ मि꣣त्र꣡स्य꣢ साधथ꣣स्त꣡र꣢न्ती꣣ पि꣡प्र꣢ती ऋ꣣त꣢म् । प꣡रि꣢ य꣣ज्ञं꣡ नि षे꣢꣯दथुः ॥१५९८॥

म꣣ही꣡इति꣢ । मि꣣त्र꣡स्य꣢ । मि꣣ । त्र꣡स्य꣢꣯ । सा꣣धथः । त꣡र꣢꣯न्तीइ꣡ति꣢ । पि꣡प्र꣢꣯ती꣣इ꣡ति꣢ । ऋ꣣त꣢म् । प꣡रि꣢꣯ । य꣣ज्ञ꣢म् । नि । से꣣दथुः ॥१५९८॥

Mantra without Swara
मही मित्रस्य साधथस्तरन्ती पिप्रती ऋतम् । परि यज्ञं नि षेदथुः ॥

महीइति । मित्रस्य । मि । त्रस्य । साधथः । तरन्तीइति । पिप्रतीइति । ऋतम् । परि । यज्ञम् । नि । सेदथुः ॥१५९८॥

Samveda - Mantra Number : 1598
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
हे आत्मा और बुद्धि ! (मही) महान् तुम दोनों (मित्रस्य) मित्र उपासक की (साधथः) योगसाधना को पूर्ण करते हो। (तरन्ती) योग के विघ्नों को पार करते हुए, (ऋतम्) सत्य को (पिप्रती) पूर्ण करते हुए तुम दोनों (यज्ञम्) योगी के योग-यज्ञ को (परि निषेदथुः) चारों ओर से व्याप्त करते हो ॥३॥
Essence
जीवात्मा के बिना बुद्धि और बुद्धि के बिना जीवात्मा योग सिद्ध नहीं कर सकते। दोनों आपस में मिलकर ही योगयज्ञ की पूर्ति करते हैं ॥३॥
Subject
अब दोनों के आश्रय से योगसिद्धि होने का वर्णन करते हैं।