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Samveda Mantra 1587

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेध्यातिथिः काण्वः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
इ꣢न्द्र꣣मि꣢द्दे꣣व꣡ता꣢तय꣣ इ꣡न्द्रं꣢ प्र꣣꣬यत्य꣢꣯ध्व꣣रे꣢ । इ꣡न्द्र꣢ꣳ समी꣣के꣢ व꣣नि꣡नो꣢ हवामह꣣ इ꣢न्द्रं꣣ ध꣡न꣢स्य सा꣣त꣡ये꣢ ॥१५८७॥

इ꣡न्द्र꣢꣯म् । इत् । दे꣣व꣡ता꣢तये । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । प्र꣡यति꣢꣯ । प्र꣣ । यति꣢ । अ꣣ध्वरे꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । स꣣मीके꣢ । स꣣म् । ईके꣢ । व꣣नि꣡नः꣢ । ह꣣वामहे । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । ध꣡न꣢꣯स्य । सा꣣त꣡ये꣢ ॥१५८७॥

Mantra without Swara
इन्द्रमिद्देवतातय इन्द्रं प्रयत्यध्वरे । इन्द्रꣳ समीके वनिनो हवामह इन्द्रं धनस्य सातये ॥

इन्द्रम् । इत् । देवतातये । इन्द्रम् । प्रयति । प्र । यति । अध्वरे । इन्द्रम् । समीके । सम् । ईके । वनिनः । हवामहे । इन्द्रम् । धनस्य । सातये ॥१५८७॥

Samveda - Mantra Number : 1587
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 2;

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Meaning
(इन्द्रम् इत्) जगदीश्वर को ही (देवतातये) यज्ञ के आरम्भ के लिए, (इन्द्रम्) जगदीश्वर को ही (अध्वरे) यज्ञ के (प्रयति) प्रवृत्त होने पर, (इन्द्रम्) जगदीश्वर को ही (समीके) यज्ञ समाप्त होने पर (इन्द्रम्) जगदीश्वर को ही (धनस्य) यज्ञफल की (सातये) प्राप्ति के लिए (वनिनः) भक्ति में तन्मय होकर हम (हवामहे) पुकारते हैं ॥१॥
Essence
अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेधपर्यन्त अथवा देवपूजा, सङ्गतिकरण और दानरूप जो भी यज्ञ आयोजित किया जाता है, उसमें सदा परमेश्वर का स्मरण रखने से वह सफल होता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २४९ क्रमाङ्क पर जगदीश्वर और राजा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ यज्ञ की सफलता के लिए जगदीश्वर का आह्वान है।