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Samveda Mantra 1584

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ꣢श्व꣣ न꣢ गी꣣र्भी꣢ र꣣꣬थ्य꣢꣯ꣳ सु꣣दा꣡न꣢वो मर्मृ꣣ज्य꣡न्ते꣢ देव꣣य꣡वः꣢ । उ꣣भे꣢ तो꣣के꣡ तन꣢꣯ये दस्म विश्पते꣣ प꣢र्षि꣣ रा꣡धो꣢ म꣣घो꣡ना꣢म् ॥१५८४॥

अ꣡श्व꣢꣯म् । न । गी꣣र्भिः꣢ । र꣣थ्यम्꣢ । सु꣣दा꣡न꣢वः । सु꣣ । दा꣡न꣢꣯वः । म꣣र्मृज्य꣡न्ते꣢ । दे꣣वय꣡वः꣢ । उ꣣भे꣡इति꣢ । तो꣣के꣡इति꣢ । त꣡न꣢꣯ये । द꣣स्म । विश्पते । प꣡र्षि꣢꣯ । रा꣡धः꣢꣯ । म꣣घो꣡ना꣢म् ॥१५८४॥

Mantra without Swara
अश्व न गीर्भी रथ्यꣳ सुदानवो मर्मृज्यन्ते देवयवः । उभे तोके तनये दस्म विश्पते पर्षि राधो मघोनाम् ॥

अश्वम् । न । गीर्भिः । रथ्यम् । सुदानवः । सु । दानवः । मर्मृज्यन्ते । देवयवः । उभेइति । तोकेइति । तनये । दस्म । विश्पते । पर्षि । राधः । मघोनाम् ॥१५८४॥

Samveda - Mantra Number : 1584
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (देवयवः) दिव्य गुणों की कामनावाले (सुदानवः) भली-भाँति आत्मसमर्पण करनेवाले उपासक (रथ्यम् अश्वं न) रथ को खींचनेवाले घोड़े के समान (रथ्यम्) ब्रह्माण्ड-रथ को खींचनेवाले परमात्मा को (गीर्भिः) स्तुति-वाणियों से (मर्मृज्यन्ते) अलङ्कृत करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि हे (दस्म) दर्शनीय (विश्पते) प्रजापति परमात्मन् ! आप हमारे (तोके तनये) पुत्र-पौत्रों (उभे) दोनों में (मघोनाम्) धनियों के (राधः) धन के समान (राधः) अध्यात्मधन को, भौतिक धन को और सफलता को (पर्षि) सींचो, बहुत रूप में प्रदान करो ॥ द्वितीय—आचार्य के पक्ष में। (देवयवः) अपने पुत्रों को विद्वान् बनाना चाहते हुए (सुदानवः) उत्तम दानी गृहस्थ लोग (रथ्यम् अश्वं न) रथ को खींचनेवाले घोड़े के समान (रथ्यम्) विद्या-रूप रथ को चलानेवाले आचार्य को (गीर्भिः) प्रशंसा-वचनों से (मर्मृज्यन्ते) अलङ्कृत करते हैं और कहते हैं कि हे (दस्म) दोषों को दूर करनेवाले, (विश्पते) शिष्य रूप प्रजाओं के पालक आचार्य ! आप हमारे (तोके तनये) पुत्र और पौत्र (उभे) दोनों में (मघोनाम्) विद्या-धन के धनी गुरुजनों के (राधः) विद्यारूप धन को (पर्षि) सींचो, बहुत रूप में प्रदान करो ॥२॥ इस मन्त्र में उपमा और श्लेष अलङ्कार हैं ॥२॥
Essence
परमात्मा और आचार्य की कृपा से हमारी सन्तानें परमेश्वर-पूजक, पुरुषार्थी, विद्यावान् और धार्मिक हों ॥२॥ इस खण्ड में गुरु-शिष्य, परमात्मा-जीवात्मा और मनुष्य के उद्बोधन के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ सोलहवें अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा और आचार्य का विषय है।