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Samveda Mantra 1583

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
यो꣢꣫ विश्वा꣣ द꣡य꣢ते꣣ व꣢सु꣣ हो꣡ता꣢ म꣣न्द्रो꣡ जना꣢꣯नाम् । म꣢धो꣣र्न꣡ पात्रा꣢꣯ प्रथ꣣मा꣡न्य꣢स्मै꣣ प्र꣡ स्तोमा꣢꣯ यन्त्व꣣ग्न꣡ये꣢ ॥१५८३॥

यः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । द꣡य꣢꣯ते । व꣡सु꣢꣯ । हो꣡ता꣢꣯ । म꣣न्द्रः꣢ । ज꣡ना꣢꣯नाम् । म꣡धोः꣢꣯ । न । पा꣡त्रा꣢꣯ । प्र꣣थमा꣡नि꣢ । अ꣣स्मै । प्र꣢ । स्तो꣡माः꣢꣯ । य꣣न्तु । अग्न꣡ये꣢ ॥१५८३॥

Mantra without Swara
यो विश्वा दयते वसु होता मन्द्रो जनानाम् । मधोर्न पात्रा प्रथमान्यस्मै प्र स्तोमा यन्त्वग्नये ॥

यः । विश्वा । दयते । वसु । होता । मन्द्रः । जनानाम् । मधोः । न । पात्रा । प्रथमानि । अस्मै । प्र । स्तोमाः । यन्तु । अग्नये ॥१५८३॥

Samveda - Mantra Number : 1583
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
(होता) ब्रह्माण्ड-यज्ञ वा शिक्षा-यज्ञ का कर्ता, (जनानाम्) मनुष्यों को (मन्द्रः) आनन्द देनेवाला (यः) जो परमात्मा वा आचार्य (विश्वा वसु) सब आध्यात्मिक धनों को वा विद्या-धनों को (ददाति) देता है, (अस्मै अग्नये) ऐसे अग्रनायक परमात्मा वा आचार्य के लिए (प्रथमानि) श्रेष्ठ (मधोः पात्रा न) मधुपूर्ण पात्रों के समान (स्तोमाः) धन्यवाद के वचन (प्र यन्तु) पहुँचें ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
जैसे परमेश्वर पुरुषार्थी को भौतिक और आध्यात्मिक धन प्रदान करता है, वैसे ही आचार्य शिष्यों को विद्या-धन देता है, इसलिए वे दोनों सबके द्वारा अभिनन्दन करने योग्य हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ४४ क्रमाङ्क पर परमात्मा की स्तुति के विषय में की जा चुकी है। यहाँ एक-साथ परमात्मा और आचार्य दोनों को लक्ष्य करके कहते हैं।