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Samveda Mantra 1559

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुबुष्णिक्, समा सतोबृहती) Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
भ꣣द्रो꣡ नो꣢ अ꣣ग्नि꣡राहु꣢꣯तो भ꣣द्रा꣢ रा꣣तिः꣡ सु꣢भग भ꣣द्रो꣡ अ꣢ध्व꣣रः꣢ । भ꣣द्रा꣢ उ꣣त꣡ प्रश꣢꣯स्तयः ॥१५५९॥

भ꣣द्रः꣢ । नः꣣ । अग्निः꣢ । आ꣡हु꣢꣯तः । आ । हु꣣तः । भद्रा꣢ । रा꣣तिः꣢ । सु꣣भग । सु । भग । भद्रः꣢ । अ꣣ध्वरः꣢ । भ꣣द्राः꣢ । उ꣣त꣢ । प्र꣡श꣢꣯स्तयः । प्र । श꣣स्तयः ॥१५५९॥

Mantra without Swara
भद्रो नो अग्निराहुतो भद्रा रातिः सुभग भद्रो अध्वरः । भद्रा उत प्रशस्तयः ॥

भद्रः । नः । अग्निः । आहुतः । आ । हुतः । भद्रा । रातिः । सुभग । सु । भग । भद्रः । अध्वरः । भद्राः । उत । प्रशस्तयः । प्र । शस्तयः ॥१५५९॥

Samveda - Mantra Number : 1559
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
(आहुतः) जिसमें आहुति डाली गयी है, ऐसी (अग्निः) राष्ट्रियता की अग्नि (नः) हमारे लिए (भद्रः) शुभ हो। (रातिः) राष्ट्र के लिए की गयी दान की क्रिया (भद्रा) शुभ हो। हे (सुभग) सौभाग्यवान् राजन् ! (अध्वरः) तुम्हारे और हमारे द्वारा किया गया राष्ट्र-यज्ञ (भद्रः) शुभ हो। (उत) और (प्रशस्तयः) राष्ट्र की उन्नति से प्राप्त प्रशस्तियाँ (भद्राः) शुभ हों ॥१॥
Essence
सब प्रजाजन और राजा, मन्त्री आदि राज्याधिकारी राष्ट्रभक्त होकर मातृभूमि के लिए अपना बलिदान भी करने के लिए सदा तैयार रहें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में १११ क्रमाङ्क पर यज्ञाग्नि, अतिथि और परमात्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ राष्ट्र-विषयक भद्र की प्रार्थना है।