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Samveda Mantra 1557

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ प्रया꣢꣯ꣳसि꣣ वा꣡ह꣢सा दा꣣श्वा꣡ꣳ अ꣢श्नोति꣣ म꣡र्त्यः꣢ । क्ष꣡यं꣢ पाव꣣क꣡शो꣢चिषः ॥१५५७॥

अ꣣भि꣢ । प्र꣡या꣢꣯ꣳसि । वा꣡ह꣢꣯सा । दा꣣श्वा꣢न् । अ꣣श्नोति । म꣡र्त्यः꣢꣯ । क्ष꣡य꣢꣯म् । पा꣣वक꣡शो꣢चिषः । पा꣣वक꣢ । शो꣣चिषः ॥१५५७॥

Mantra without Swara
अभि प्रयाꣳसि वाहसा दाश्वाꣳ अश्नोति मर्त्यः । क्षयं पावकशोचिषः ॥

अभि । प्रयाꣳसि । वाहसा । दाश्वान् । अश्नोति । मर्त्यः । क्षयम् । पावकशोचिषः । पावक । शोचिषः ॥१५५७॥

Samveda - Mantra Number : 1557
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 3;

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Meaning
(दाश्वान्) आत्मसमर्पण करनेवाला (मर्त्यः) मनुष्य (वाहसा) परमेश्वर के प्रति किये गए स्तोत्र से (प्रयांसि) आनन्द-रसों को (अभि अश्नोति) पा लेता है। साथ ही (पावक-शोचिषः) पवित्रकारी ज्योतिवाले उस परमेश्वर के (क्षयम्) मोक्षधाम को भी प्राप्त कर लेता है ॥२॥
Essence
मनुष्य को योग्य है कि तेजस्वी जगदीश्वर की स्तुति से स्वयं भी उसके गुणों को धारण करके अभ्युदय तथा निःश्रेयस प्राप्त करे ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में यह कहा गया है कि परमात्मा की स्तुति से क्या प्राप्त होता है।

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