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Samveda Mantra 155

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
पा꣢न्त꣣मा꣢ वो꣣ अ꣡न्ध꣢स꣣ इ꣡न्द्र꣢म꣣भि꣡ प्र गा꣢꣯यत । वि꣣श्वासा꣡ह꣢ꣳ श꣣त꣡क्र꣢तुं꣣ म꣡ꣳहि꣢ष्ठं चर्षणी꣣ना꣢म् ॥१५५॥

पा꣡न्त꣢꣯म् । आ । वः꣣ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣भि꣢ । प्र । गा꣣यत । विश्वासा꣡ह꣢म् । वि꣣श्व । सा꣡ह꣢꣯म् । श꣣त꣡क्र꣢तुम् । श꣣त꣢ । क्र꣣तुम् । मँ꣡हि꣢꣯ष्ठम् । च꣣र्षणीना꣢म् ॥१५५॥

Mantra without Swara
पान्तमा वो अन्धस इन्द्रमभि प्र गायत । विश्वासाहꣳ शतक्रतुं मꣳहिष्ठं चर्षणीनाम् ॥

पान्तम् । आ । वः । अन्धसः । इन्द्रम् । अभि । प्र । गायत । विश्वासाहम् । विश्व । साहम् । शतक्रतुम् । शत । क्रतुम् । मँहिष्ठम् । चर्षणीनाम् ॥१५५॥

Samveda - Mantra Number : 155
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 5;

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Meaning
हे मनुष्यो ! (वः) तुम (अन्धसः) भोग्य वस्तुओं के (आ पान्तम्) सब ओर से रक्षक, (विश्वासाहम्) समस्त शत्रुओं के विजेता, (शतक्रतुम्) बहुत बुद्धिमान्, बहुत कर्मण्य, बहुत से यज्ञों को करनेवाले, (चर्षणीनाम्) मनुष्यों को (मंहिष्ठम्) अतिशय दान करनेवाले (इन्द्रम्) परमैश्वर्यशाली वीर परमात्मा और राजा को (अभि) लक्षित करके (प्र गायत) प्रकृष्ट रूप से गान करो अर्थात् उनके गुण-कर्म-स्वभावों का वर्णन करो ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेष और परिकर अलङ्कार है ॥१॥
Essence
सब मनुष्यों को योग्य है कि वे जगत् के रक्षक, समस्त काम-क्रोधादि रिपुओं के विजेता, असंख्य प्रज्ञाओं, असंख्य कर्मों और असंख्य यज्ञों से युक्त, सब मनुष्यों को विद्या, धन, धर्म आदि का अतिशय दान करनेवाले परमात्मा के और राष्ट्र के रक्षक, शत्रु-सेनाओं को हरानेवाले, विद्वान्, कर्मठ, अनेक यज्ञों के याज्ञिक, प्रजाओं को अतिशय विद्या, आरोग्य, धन आदि देनेवाले राजा के प्रति उनके गुण-कर्म-स्वभाव का वर्णन करनेवाले स्तुति-गीत और उद्बोधन-गीत गायें ॥१॥
Subject
प्रथमः—मन्त्र में इन्द्र के महिमागान के लिए मनुष्यों को प्रेरित किया गया है।